ला इरका ...मजहब के मामले में जबर्दस्ती नहीं

हजरत मुहम्मद साहब ने कहा है, ला इरका फि़द्दीन यानी मजहब के मामले में कोई जबर्दस्ती नहीं। इस कथन से साफ पता चलता है कि उनको इस्लाम के विस्तार में तलवार की नोक का सहारा लेने में अनुयायियों के जोश और आक्रामकता को उन्होंने बिल्कुल उचित नहीं माना। 

हजरत किसी भी व्यक्ति के दिल को दुखाने को सबसे बड़ा गुनाह मानते थे। हजरत मुहम्मद ने इस्लाम को जब अरब में उतारा तो यह पूरी तरह से एक बेहद शांतिप्रिय व आधुनिक धर्म था, मगर समय गुजरने के साथ कुछ लोगों ने इसे रूढ़िवाद की ओर मोड़ने का यत्न किया। आज भी सभी मुसलमान यदि हजरत की बताई राह पर चलें तो इस संप्रदाय की अनेक समस्याएं यूं ही समाप्त हो जाएं। आज मुसलमान विश्व भर में तीसरी ईद मना रहे हैं, जिसे ईद-ए-मिलाद-उल-नबी के नाम से जाना जाता है।

ऐसा समझा जाता है ईद होती है -ईद-उल-फित्र और ईद-उज़-जुहा। मगर एक तीसरी भी है, जिसको कम लोग जानते हैं, क्योंकि इसे थोड़ी सादगी सेमनाया जाता है।इस तीसरी ईद के दिन हजरत मुहम्मद का जन्म 12 रबी-उल-अव्वल इस्लामी मास 570 ई. को मक्का में हुआ था। संयोगवश इसी रोज हजरत का देहांत भी हुआ था।हजरत मुहम्मद साहब के जन्म के समय अरब संसार जघन्य व घृणित पापों के अंधेरे में डूबा हुआ था। कोई भी अन्याय और दुराचार ऐसा न था जो उस समय प्रचलित न हो। धोखाधड़ी, बेईमानी, क़त्ल, बलात्कार, नारी-अपमान और हिंसा आदि सामान्य जीवन के अंग बन चुके थे। इस दूषित वातावरण में जब हजरत ने आंखें खोली तो पाया कि लोगों को सीधे रास्ते पर लाने का दायित्व उन्हें निभाना ही चाहिए।हजरत मुहम्मद के चेहरे के बारे में किसी ने एक सहाबी, जाबिर बिन सुमरा से प्रश्न किया, क्या हुज़ूर का चेहरा तलवार जैसा चमकता था? नहीं, सहाबी बोले, चांद की तरह! इसका मतलब यही हुआ कि वे अमन और प्रेम के दूत थे। 

25 वर्ष की आयु में हुजूर ने हजरत ख़दीजा से विवाह किया जो एक विधवा थीं। इस्लाम में विधवा का बड़ा विशेष स्थान है। उसे 'यतीम' का दर्जा दिया गया है। यतीम अर्थात अनाथ की सेवा का इमना है स्वर्ग में उच्च स्थान की प्राप्ति। महिलाओं का हजरत मुहम्मद विशेष आदर करते थे। उनका मानना था कि जो भी शख्स तीन बच्चियों की परवरिश करता है और उनका विवाह करा देता है, उसे जन्नतुल फि़रदौस (स्वर्ग)में अच्छा स्थान प्राप्त होगा। 

इस्लाम में एक से अधिक विवाह करने पर कई भ्रांतियां हैं, जिसको यहां समझाना आवश्यक है। एक से अधिक विवाह का प्रचलन उस समय हुआ जब 'उहद' के युद्ध में सैकड़ों मुसलमान मारे गए और उनकी पत्नियां बेसहारा हो गईं व उनकी संतानों को भोजन देने वाले नहीं रहे। तब औरत की सम्मान जनक जिंदगी को बनाए रखने के लिए एक से अधिक विवाह की अनुमति दी गई। 

सूरा-ए- अन-निसा के तीसरे भाग में लिखा है कि एक से अधिक विवाह उसी सूरत में किए जा सकते हैं, जब कि पुरुष हर महिला को मानसिक बराबरी भी प्रदान कर सके। लेकिन वास्तव में ऐसा करना संभव नहीं, क्योंकि एक से अधिक पत्नियों को शारीरिक रूप से तो संतुष्ट किया जा सकता है परंतु मानसिक रूप से नहीं। यह सख्त शर्त इसीकारण रखी गई है। 

दूसरे, इस प्रकार का विवाह उसी स्थिति में किया जा सकता है जब पत्नी बांझ हो या उसे कोई लाइलाज मर्ज हो और वह सहवास योग्य नहीं हो। यदि कोई मुसलमान 'विविधता' के लिए अनेक विवाह करता है तो वह गैर इस्लामी कार्य होगा। यही कारण है कि इंडोनेशिया, पाकिस्तान और तुर्की में दूसरे विवाह के लिए अदालत से इजाजत लेनी पड़ती है। ऐसे लोग बजाय इस्लाम की सेवा करने के, उसको क्षति पहुंचाते हैं। 

महिला के लिए तो हजरत मुहम्मद ने यहां तक कहा है कि मां के पैरों तले जन्नत होती है। वे कहते थे कि महिलाओं को सर्वोच्च शिक्षा देनी चाहिए। उनकी पत्नी हजरत खदीजा जो उनसे आयु में 15 वर्ष बड़ी थीं, एक उच्च शिक्षित महिला थीं।

1 comment:

arvind hydrabad said...

aisa he chante raha to ek din muslim hindustan ko kha jayange jaago bhaiyo jai sri ram