मूलनिवासी आंदोलन: माइकल बामशाद के DNA रिसर्च का पर्दाफाश


वामपंथी, नव-बौद्ध और बामसेफ जैसी संस्थाओं ने पिछले कुछ वर्षों से भारत को तोड़ने और भारत में गृहयुद्ध जैसी स्थिति पैदा करने के उद्देश्य से एक बिना-सिर पैर का एक आंदोलन चला  रहें हैं जिसे वे मूलनिवासी आंदोलन कहा करते हैं और यह दावा करते हैं की दलित अथवा शूद्र ( अनुसूचित जाति / जनजाति ) के लोग भारत के मूल निवासी हैं और बाकि उच्च वर्ग के लोग ( ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य ) आर्य हैं और भारत में बाहर से आये हैं, इनकी इस परिकल्पना और और अधिक बल तब मिला जब सन 2001 में अंग्रेजी समाचार पत्र "टाइम्स ऑफ़ इंडिया" में एक खबर छपी कि अमेरिका के वाशिंगटन में उत्ताह विश्वविद्यालय के पीडियाट्रिक्स डिपार्टमेंट के विभागाध्यक्ष माइकल बामशाद ने DNA टेस्ट के आधार पर बताया है कि भारत की अनुसूचित जाति / जनजाति के लोगों का का DNA एक जैसा है तथा विदेशियों और सामान्य वर्ग ( ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य ) का एक जैसा, जिससे उसने निष्कर्ष निकाला है कि ब्राह्मण ,क्षत्रिय ,वैश्य आदि विदेशी थे और अनुसूचित जाति / जनजाति के लोग भारत के मूलनिवासी।

अब ज्यादातर लोगो ने इस रिपोर्ट को पढ़े या बिना ही इस रिपोर्ट को अपने आंदोलन का आधार बना कर पेश करना शुरू कर दिया, जबकि यह जो भी रिसर्च हुई थी उसका सत्य यह था कि माइकल ने केवल दक्षिण भारत के आंध्र प्रदेश के 1 या 2  गाँवों का ही DNA टेस्ट ही करवाया था जबकि  100  करोड़ आबादी में 1  या 2 गाँवों से निष्कर्ष निकालना क्या तर्क संगत हो सकता है ? क्या आप इस तरह के रिसर्च के परिणाम को सही मान सकतें हैं ?

यह देखिये इस रिपोर्ट में साफ़ लिखा है कि ये निष्कर्ष आंध्र प्रदेश की जनता का है....



अब पढ़िए माइकल बामशाद की यह रिपोर्ट :



अब यह तो हुई आंध्र पदेश के गाँवों के लोगो के DNA की जांच की बात, इसी तरह और भी कई शोध किये गए हैं लेकिन बाबा साहेब के आंदोलन को भटकाने वाले मूलनिवासी के झूठ को फैलाने वाले और किसी शोध की बात क्यों नहीं करते ? क्यों एक झूठे और अप्रमाणिक शोध को ही फैलाया जाता है ? अब देखिये एक और शोध का क्या परिणाम आया है :

फिनलैण्ड के तारतू विश्वविद्यालय, एस्टोनिया में भारतीयों के डीनएनए गुणसूत्र पर आधारित एक अनुसंधान हुआ। कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉं. कीवीसील्ड के निर्देशन में एस्टोनिया स्थित एस्टोनियन बायोसेंटर, तारतू विश्वविद्यालय के शोधछात्र ज्ञानेश्वर चौबे ने अपने अनुसंधान में यह सिद्ध किया है कि सारे भारतवासी जीन अर्थात गुणसूत्रों के आधार पर एक ही पूर्वजों की संतानें हैं, आर्य और द्रविड़ का कोई भेद गुणसूत्रों के आधार पर नहीं मिलता है, और तो और जो अनुवांशिक गुणसूत्र भारतवासियों में पाए जाते हैं वे डीएनए गुणसूत्र दुनिया के किसी अन्य देश में नहीं पाए गए।

शोधकार्य में वर्तमान भारत, पाकिस्तान, बंगलादेश, श्रीलंका और नेपाल की जनसंख्या में विद्यमान लगभग सभी जातियों, उपजातियों, जनजातियों के लगभग 13000 नमूनों के परीक्षण-परिणामों का इस्तेमाल किया गया। इनके नमूनों के परीक्षण से प्राप्त परिणामों की तुलना मध्य एशिया, यूरोप और चीन-जापान आदि देशों में रहने वाली मानव नस्लों के गुणसूत्रों से की गई। इस तुलना में पाया गया कि सभी भारतीय चाहे वह किसी भी धर्म को मानने वाले हैं, 99 प्रतिशत समान पूर्वजों की संतानें हैं। इससे यह सिद्ध होता है कि भारत में आर्य और द्रविड़ विवाद व्यर्थ है। उत्तर और दक्षिण भारतीय एक ही पूर्वजों की संतानें हैं।

शोध में पाया गया है कि तमिलनाडु की सभी जातियों-जनजातियों, केरल, कर्नाटक, आन्ध्रप्रदेश जिन्हें पूर्व में कथित द्रविड़ नस्ल से प्रभावित माना गया है, की समस्त जातियों के डीनएन गुणसूत्र तथा उत्तर भारतीय जातियों-जनजातियों के डीएनए का उत्पत्ति-आधार गुणसूत्र एकसमान है। उत्तर भारत में पाये जाने वाले कोल, कंजर, दुसाध, धरकार, चमार, थारू, दलित, क्षत्रिय और ब्राह्मणों के डीएनए का मूल स्रोत दक्षिण भारत में पाई जाने वाली जातियों के मूल स्रोत से कहीं से भी अलग नहीं हैं।

इसी के साथ जो गुणसूत्र उपरोक्त जातियों में पाए गए हैं वहीं गुणसूत्र मकरानी, सिंधी, बलोच, पठान, ब्राहुई, बुरूषो और हजारा आदि पाकिस्तान में पाए जाने वाले समूहों के साथ पूरी तरह से मेल खाते हैं।

अब इस शोध के बारे में इन मूलनिवासी के कुप्रचार करने वालों का क्या कहना होगा ??

उपरोक्त शोध बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर जी के कथन को भी सिद्ध करता है, उन्होंने लिखा है कि शूद्र आर्य थे और वे क्षत्रिय थे। वे क्षत्रियों में इतने उत्तम और महत्वपूर्ण वर्ण के थे कि प्रचीन आर्यों के समुदाय में अनेक शूद्र तेजस्वी और बलशाली राजा थे। उन्होंने मैक्समूलर के सिद्धान्त का खण्डन करते हुए विस्तार से लिखा है कि ऋग्वेद में पुरुष सूक्त एक क्षेपक है, जो चार वर्ण की बात करता है। उनके अनुसार वर्ण तीन थे और शूद्र दूसरे वर्ण क्षत्रिय से सम्बन्धित थे।

चौथा वर्ण कब बना और शूद्र उसमें कब ढकेले गये? इस पर आंबेडकर का मत है कि क्षत्रिय और ब्राह्मणों के संघर्ष के कारण चैथा वर्ण शूद्र बना। ब्राह्मणों ने उनका उपनयन बन्द कर उन्हें शूद्र बनाया। ब्राह्मणों की यह प्रतिक्रिया शूद्र राजाओं के द्वारा उनके साथ किये गये अत्याचार, उत्पीड़न और अपमान के कारण थी, जिसका आशय था प्रतिशोध की भावना....

लेकिन अपने आप को डॉ. आंबेडकर जी का अनुयायी और आंबेडकरवादी बताने वाले ये दलित दुश्मन डॉ. आंबेडकर जी के तथ्यों को भी मानने को तैयार नहीं, अब दलित समाज को स्वयं ही सोचना होगा कि वे किन लोगों के हाथों में खेल रहें हैं ?

3 comments:

Unknown said...

Bhai or koi rasta nhi mila to report ko hi galat sabit kr diya.... tumhe zarurat hai ki tum apni research fir se kro.... mulnivasi hone ka dawa sirf bamsad k report hi nhi or bhi annya researchers or historions k sath sath bahut se sabuton k adhar pr kiya gya hai... or yahi sattya hai....

vipul kumar said...

Fake..

vipul kumar said...

Fake news