मूलनिवासी आंदोलन: माइकल बामशाद के DNA रिसर्च का पर्दाफाश


वामपंथी, नव-बौद्ध और बामसेफ जैसी संस्थाओं ने पिछले कुछ वर्षों से भारत को तोड़ने और भारत में गृहयुद्ध जैसी स्थिति पैदा करने के उद्देश्य से एक बिना-सिर पैर का एक आंदोलन चला  रहें हैं जिसे वे मूलनिवासी आंदोलन कहा करते हैं और यह दावा करते हैं की दलित अथवा शूद्र ( अनुसूचित जाति / जनजाति ) के लोग भारत के मूल निवासी हैं और बाकि उच्च वर्ग के लोग ( ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य ) आर्य हैं और भारत में बाहर से आये हैं, इनकी इस परिकल्पना और और अधिक बल तब मिला जब सन 2001 में अंग्रेजी समाचार पत्र "टाइम्स ऑफ़ इंडिया" में एक खबर छपी कि अमेरिका के वाशिंगटन में उत्ताह विश्वविद्यालय के पीडियाट्रिक्स डिपार्टमेंट के विभागाध्यक्ष माइकल बामशाद ने DNA टेस्ट के आधार पर बताया है कि भारत की अनुसूचित जाति / जनजाति के लोगों का का DNA एक जैसा है तथा विदेशियों और सामान्य वर्ग ( ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य ) का एक जैसा, जिससे उसने निष्कर्ष निकाला है कि ब्राह्मण ,क्षत्रिय ,वैश्य आदि विदेशी थे और अनुसूचित जाति / जनजाति के लोग भारत के मूलनिवासी।

अब ज्यादातर लोगो ने इस रिपोर्ट को पढ़े या बिना ही इस रिपोर्ट को अपने आंदोलन का आधार बना कर पेश करना शुरू कर दिया, जबकि यह जो भी रिसर्च हुई थी उसका सत्य यह था कि माइकल ने केवल दक्षिण भारत के आंध्र प्रदेश के 1 या 2  गाँवों का ही DNA टेस्ट ही करवाया था जबकि  100  करोड़ आबादी में 1  या 2 गाँवों से निष्कर्ष निकालना क्या तर्क संगत हो सकता है ? क्या आप इस तरह के रिसर्च के परिणाम को सही मान सकतें हैं ?

यह देखिये इस रिपोर्ट में साफ़ लिखा है कि ये निष्कर्ष आंध्र प्रदेश की जनता का है....



अब पढ़िए माइकल बामशाद की यह रिपोर्ट :



अब यह तो हुई आंध्र पदेश के गाँवों के लोगो के DNA की जांच की बात, इसी तरह और भी कई शोध किये गए हैं लेकिन बाबा साहेब के आंदोलन को भटकाने वाले मूलनिवासी के झूठ को फैलाने वाले और किसी शोध की बात क्यों नहीं करते ? क्यों एक झूठे और अप्रमाणिक शोध को ही फैलाया जाता है ? अब देखिये एक और शोध का क्या परिणाम आया है :

फिनलैण्ड के तारतू विश्वविद्यालय, एस्टोनिया में भारतीयों के डीनएनए गुणसूत्र पर आधारित एक अनुसंधान हुआ। कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉं. कीवीसील्ड के निर्देशन में एस्टोनिया स्थित एस्टोनियन बायोसेंटर, तारतू विश्वविद्यालय के शोधछात्र ज्ञानेश्वर चौबे ने अपने अनुसंधान में यह सिद्ध किया है कि सारे भारतवासी जीन अर्थात गुणसूत्रों के आधार पर एक ही पूर्वजों की संतानें हैं, आर्य और द्रविड़ का कोई भेद गुणसूत्रों के आधार पर नहीं मिलता है, और तो और जो अनुवांशिक गुणसूत्र भारतवासियों में पाए जाते हैं वे डीएनए गुणसूत्र दुनिया के किसी अन्य देश में नहीं पाए गए।

शोधकार्य में वर्तमान भारत, पाकिस्तान, बंगलादेश, श्रीलंका और नेपाल की जनसंख्या में विद्यमान लगभग सभी जातियों, उपजातियों, जनजातियों के लगभग 13000 नमूनों के परीक्षण-परिणामों का इस्तेमाल किया गया। इनके नमूनों के परीक्षण से प्राप्त परिणामों की तुलना मध्य एशिया, यूरोप और चीन-जापान आदि देशों में रहने वाली मानव नस्लों के गुणसूत्रों से की गई। इस तुलना में पाया गया कि सभी भारतीय चाहे वह किसी भी धर्म को मानने वाले हैं, 99 प्रतिशत समान पूर्वजों की संतानें हैं। इससे यह सिद्ध होता है कि भारत में आर्य और द्रविड़ विवाद व्यर्थ है। उत्तर और दक्षिण भारतीय एक ही पूर्वजों की संतानें हैं।

शोध में पाया गया है कि तमिलनाडु की सभी जातियों-जनजातियों, केरल, कर्नाटक, आन्ध्रप्रदेश जिन्हें पूर्व में कथित द्रविड़ नस्ल से प्रभावित माना गया है, की समस्त जातियों के डीनएन गुणसूत्र तथा उत्तर भारतीय जातियों-जनजातियों के डीएनए का उत्पत्ति-आधार गुणसूत्र एकसमान है। उत्तर भारत में पाये जाने वाले कोल, कंजर, दुसाध, धरकार, चमार, थारू, दलित, क्षत्रिय और ब्राह्मणों के डीएनए का मूल स्रोत दक्षिण भारत में पाई जाने वाली जातियों के मूल स्रोत से कहीं से भी अलग नहीं हैं।

इसी के साथ जो गुणसूत्र उपरोक्त जातियों में पाए गए हैं वहीं गुणसूत्र मकरानी, सिंधी, बलोच, पठान, ब्राहुई, बुरूषो और हजारा आदि पाकिस्तान में पाए जाने वाले समूहों के साथ पूरी तरह से मेल खाते हैं।

अब इस शोध के बारे में इन मूलनिवासी के कुप्रचार करने वालों का क्या कहना होगा ??

उपरोक्त शोध बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर जी के कथन को भी सिद्ध करता है, उन्होंने लिखा है कि शूद्र आर्य थे और वे क्षत्रिय थे। वे क्षत्रियों में इतने उत्तम और महत्वपूर्ण वर्ण के थे कि प्रचीन आर्यों के समुदाय में अनेक शूद्र तेजस्वी और बलशाली राजा थे। उन्होंने मैक्समूलर के सिद्धान्त का खण्डन करते हुए विस्तार से लिखा है कि ऋग्वेद में पुरुष सूक्त एक क्षेपक है, जो चार वर्ण की बात करता है। उनके अनुसार वर्ण तीन थे और शूद्र दूसरे वर्ण क्षत्रिय से सम्बन्धित थे।

चौथा वर्ण कब बना और शूद्र उसमें कब ढकेले गये? इस पर आंबेडकर का मत है कि क्षत्रिय और ब्राह्मणों के संघर्ष के कारण चैथा वर्ण शूद्र बना। ब्राह्मणों ने उनका उपनयन बन्द कर उन्हें शूद्र बनाया। ब्राह्मणों की यह प्रतिक्रिया शूद्र राजाओं के द्वारा उनके साथ किये गये अत्याचार, उत्पीड़न और अपमान के कारण थी, जिसका आशय था प्रतिशोध की भावना....

लेकिन अपने आप को डॉ. आंबेडकर जी का अनुयायी और आंबेडकरवादी बताने वाले ये दलित दुश्मन डॉ. आंबेडकर जी के तथ्यों को भी मानने को तैयार नहीं, अब दलित समाज को स्वयं ही सोचना होगा कि वे किन लोगों के हाथों में खेल रहें हैं ?

भगवान बुद्ध और गौतम बुद्ध में क्या अंतर है ?


१. बुद्ध:


यज्ञादि श्रौत-स्मार्त कर्म अनाधिकारी दानवों के हाथ में जाने पर अनाचार होने लगा । उस समय भगवान बुद्ध ने अवतार धारण कर दानवों से विवाद किया और मोहित कर उन्हें यज्ञ से परावृत्त किया ।


एवं बुध्यत बुध्यध्वं बुध्यतैवमितीरयन् ।
मायामोहः स दैत्येयान् धर्ममत्याजयन्निजम् ॥ 

– विष्णुपुराण, अंश ३, अध्याय १८, श्‍लोक २०


अर्थ : बुध्यत (जानिए), बुध्यध्वम् (समझ लें), बुध्यत (ध्यान दें) आदि शब्दों द्वारा मायामोह से (भगवान बुद्ध ने) दैत्यों को (यज्ञ के अनाधिकारियों को) उपदेश कर उनके चंगुल से धर्म को मुक्त किया ।


श्रीविष्णु के नौवें अवतार, बौद्ध धर्म संस्थापक गौतम बुद्ध से भिन्न हैं । इसकी कारणमीमांसा आगे दी है । इससे समझ में आएगा कि, श्रीविष्णु ने ही अवतार धारण कर बौद्ध धर्म की स्थापना की, यह धारणा कितनी अयोग्य है ।


२. भगवान बुद्ध और गौतम बुद्ध में भेद:


भगवान बुद्ध और गौतम बुद्ध में भेद

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भगवान बुद्ध ही गौतम बुद्ध हैं, इस धारणा के कारण –


अ. अमरकोश नामक संस्कृत समानार्थी शब्दों के कोश में लिखा है कि भगवान बुद्ध व गौतम बुद्ध के नाम समानार्थी हैं । इसके साथ अमरकोश का सर्वत्र प्रसार होने से ऐसी धारणा हुई कि दोनों व्यक्ति समान हैं ।


आ. भगवान बुद्ध और गौतम बुद्ध, दोनों का गोत्र गौतम था ।


इ. अग्निपुराण में भगवान बुद्ध का ध्यान दिया है । इसमें भगवान बुद्ध की मूर्ति का वर्णन दिया है । आगे बौद्ध धर्मियों ने गौतम बुद्ध की मूर्तियां इसी वर्णनानुसार बनाईं, इसलिए दोनों बुद्धों की मूर्तियां समान हुईं ।


संदर्भ ग्रंथ : श्रीशिवावतार भगवत्पाद शंकराचार्य, पृ. ३५४ से ३६० का सारांश, 
रचयिता : श्रीगोवर्धनमठ-पुरीपीठाधीश्‍वर-श्रीमज्जगद्गुरु-शंकराचार्य स्वामी निश्‍चलानंदसरस्वती

Deshbhakti Manthan

Wishing all the Hindustanis a very happy Raksha Bandhan----- JagdishKumar

यह भी जानिये: इस्लाम में भी होतें हैं नागा पीर


नंगा पीर अहद बाबा कश्मीर वाले जो हमेशा नंगे ही रहते हैं, और इनके भक्तों में 90% महिलायें ही होती हैं। इस्लामिक परम्परा में ऐसे कई सूफी संत, पीर-फ़क़ीर बाबा हुए हैं, जिन्होंने खुदा की इबादत नंगे रहकर की। इसलिए किसी गैर-मजहब के धार्मिक आस्था-परम्परा पर ऊँगली उठाने से पहले खुद के गिरेबां में झाँक लें।

यह वह भूमि है,जहाँ दुनिया में सबसे पहले सभ्यता आई।

मोहम्मद साहब (जन्म-570 ईस्वी) जब चाँद के दो टुकड़े कर रहे थे, पृथ्वी को चपटी कालीन और आसमान को डंडे से ऊँचा करना, हलाला-मुताह जैसी रिवाज अरब के बद्दू कबीलों को पढ़ा रहे थे ---- तो उनसे 94 साल पहले जन्मे महान गणितज्ञ, खगोलशास्त्री व ज्योतिषविद आर्यभट्ट (जन्म 476 ईस्वी) ने आर्यभटीय ग्रंथ में ब्रह्माण्ड की काल गणनाओ, ग्रहों की गति, astronomical constants, sine table, पाई (pi) का actual value सहित गोलाकार पृथ्वी अपने अक्ष पर घूमती है बता चुके थे।

ज्ञान-अध्यात्म ही नहीं वस्त्र-आभूषण और भाषा के क्षेत्र में भी भारत दुनिया से कहीं बहुत आगे रहा है। आज अगर नागा बाबा और दिगम्बर जैन साधु नंगे रहते हैं तो इसमें उनकी जाहिलता नहीं है, यह उनकी धार्मिक परम्परा है।

लॉजिकल आलोचना और जाहिल की तरह कुतर्क के बीच अंतर को समझे

शनिशिंगणापुर के शनिदेव के चबुतरे पर महिलाआें को प्रवेश करने के लिए प्रतिबंध क्यों ?


महाराष्ट्र के सुप्रसिद्ध शनिशिंगणापूर देवस्थान अंतर्गत शनिदेव के चबुतरेपर महिलाआें को प्रवेश के लिए प्रतिबंध होते हुए भी एक महिलाने चबुतरे पर चढकर शनिदेव को तेलार्पण किया । इस घटना के संदर्भ में एबीपी माझा, आयबीएन् लोकमत इत्यादी समाचार चैनलों पर स्त्रीमुक्ती, पुरषसत्ताक संस्कृति, मंदिर संस्कृति का प्रतिगामीपन, पुरानी विचारधारा आदी दृष्टिकोण को लेकर चर्चा चल रही है । यह विषय धार्मिक दृष्टि से अधिक महत्त्वपूर्ण होने के कारण हम इस विषय पर इसका आध्यत्मिक पक्ष रख रहे है ।

१. शनिशिंगणापूर में शनिदेव की स्वयंभू मूर्ती एक चबुतरे पर खडी है । मंदिर प्रबंधन ने कुछ वर्ष पूर्व ही चबुतरे पर चढकर शनिदेव को तेलार्पण करने पर प्रतिबंध लगा दिया था । इसलिए आज आए दिन सभी जाति-धर्म के स्री-पुरूष श्री शनिदेव का दर्शन दूर से ही करते हैं । इसलिए वहां मात्र महिलाआें पर ही प्रतिबंध है, ऐसा कहना अनुचित है ।

२. अध्यात्मशास्र के अनुसार प्रत्येक देवता का कार्य निर्धारित होता है । उस कार्य के अनुसार संबंधित देवता की प्रकटशक्ति कार्यरत होती है । शनि देवता उग्रदेवता होने के कारण उसमें होनेवाली प्रकटशक्ति के कारण महिलाआें को कष्ट होने की संभावना होती है । शनिशिंगणापूर में 400-500 वर्ष पूर्व शनिदेव का मंदिर बना । तबसे लेकर वहां महिलाआें के लिए चबुतरे के नीचे से दर्शन करने की परंपरा है ।

३. अशुद्ध होते समय, साथ ही चमड़े की वस्तूएं (घडी का पट्टा, कमर का पट्टा) आदी पहने हुए पुरूषों के लिए भी शनिदेव के चबुतरे पर प्रवेश करने के लिए प्रतिबंध है । इतना ही नहीं, अपितु पुरूषों को चबुतरे पर चढने के पूर्व स्नान के द्वारा शरिरशुद्धी करना, साथ ही केवल श्‍वेतवस्र ही धारण करना आवश्यक होतें है । इन नियमों का पालन करने वालों को ही मात्र शनिदेव के चबुतरे पर प्रवेश है ।

४. हिन्दु धर्म में कुछ देवताआें की उपासना कुछ विशिष्ट कारणों के लिए ही की जाती है । शनिदेव उन देवताआें में से एक हैं । विशिष्ट ग्रहदशा, जैसे कि साढेसाती आदि के समय में उनकी उपासना की जाती है । यह सकाम साधना होने के कारण सकाम साधना करनेवाले को उस साधना से संबंधित नियमों का पालन करनेसे मात्र ही उसका फल प्राप्त होता है । हमने यदि मनगंढत नियम बनाए, तो उसमेंसे केवल मानसिक संतोष होगा; परंतु आध्यात्मिक लाभ नहीं होगा ।

५. यह विषय स्त्रीमुक्ति का न होकर वह पूर्णरूप से आध्यात्मिक स्तर का है । इसलिए इस विषय पर चर्चा मात्र सामाजिक दृष्टिकोण से, या धर्म का अध्ययन न करने वालों से करना अनुचित ही है  किसी विषय के विशेषज्ञ को ही इस विषय पर बात करनी चाहिए । जैसे कोई वकील किसी रोगी को औषधि नहीं दे सकता, उसी प्रकार इस विषय पर सामाजिक कार्यकर्ताआें से समाचार चैनलों पर चर्चा नहीं की जा सकती ।

६. शनिदेव के चबुतरे पर महिलाआें के प्रवेश मिले, इसलिए स्रीमुक्ति का आक्रोश करने वाले धर्मद्रोही मस्जिदों में महिलाआें को प्रवेश मिले; इसलिए क्यों नहीं चिल्लाते ?

श्री. चेतन राजहंस, प्रवक्ता, सनातन संस्था

दुनिया मनाती है 70 नववर्ष पढ़िए आपका कौन सा ?


जनवरी की पहली तारीख कल आने ही वाली है। पहली जनवरी यानी वर्ष का पहला दिन.. इस दिन के साथ दुनिया के ज्यादातर लोग अपने नए साल की शुरुवात करते हैं। नए का आत्मबोध हमारे अंदर नया उत्साह भरता है और नए तरीके से जीवन जीने का संदेश देता है। हालांकि ये उल्लास, ये उत्साह दुनिया के अलग-अलग कोने में अलग-अलग दिन मनाया जाता है क्योंकि दुनिया भर में कई कैलेंडर हैं और हर कैलेंडर का नया साल अलग-अलग होता है। एक अनुमान के अनुसार अकेले भारत में ही करीब ५० कैलेंडर (पंचाग) हैं और इनमें से कई का नया साल अलग दिनों पर होता है। 

एक जनवरी को मनाया जाने वाला नववर्ष दरअसल ग्रेगोरियन कैलेंडर पर आधारित है। इसकी शुरुआत रोमन कैलेंडर से हुई है। पारंपरिक रोमन कैलेंडर का नववर्ष एक मार्च से शुरू होता है। प्रसिद्ध रोमन सम्राट जूलियस सीजर ने ४७ ईसा पूर्व में इस कैलेंडर में परिवर्तन किया और इसमें जुलाई माह जोड़ा। इसके बाद उसके भतीजे के नाम के आधार पर इसमें अगस्त माह जोड़ा गया। दुनिया भर में आज जो कैलेंडर प्रचलित है, उसे पोप ग्रेगोरी अष्टम ने १५८२ में तैयार किया था। ग्रेगोरी ने इसमें लीप ईयर का प्रावधान किया था। 

ईसाइयों का एक अन्य पंथ ईस्टर्न आर्थोडॉक्स चर्च तथा इसके अनुयायी ग्रेगोरियन कैलेंडर को मान्यता न देकर पारंपरिक रोमन कैलेंडर को ही मानते हैं। इस कैलेंडर के अनुसार नया साल १४ जनवरी को मनाया जाता है। इस कैलेंडर की मान्यता के अनुसार जॉर्जिया, रूस, यरूशलम, सर्बिया आदि में १४ जनवरी को नववर्ष मनाया जाता है। 

इस्लाम धर्म के कैलेंडर को हिजरी साल के नाम से जाना जाता है। इसका नववर्ष मोहर्रम माह के पहले दिन होता है। मौजूदा हिजरी संवत १४३० इस साल ३० दिसंबर को शुरू हुआ था। हिजरी कैलेंडर कर्बला की लड़ाई के पहले ही निर्धारित कर लिया गया था। मोहर्रम के दसवें दिन को आशूरा के रूप में जाना जाता है। इसी दिन पैगम्बर मोहम्मद के नवासे इमाम हुसैन बगदाद के निकट कर्बला में शहीद हुए थे। हिजरी कैलेंडर के बारे में एक दिलचस्प बात यह है कि इसमें चंद्रमा की घटती - बढ़ती चाल के अनुसार दिनों का संयोजन नहीं किया गया है। लिहाजा इसके महीने हर साल करीब १० दिन पीछे खिसकते रहते हैं। 

यदि पड़ोसी देश और देश की पुरानी सभ्यताओं में से एक चीन की बात करें तो वहाँ का भी अपना एक अलग कैलेंडर है। तकरीबन सभी पुरानी सभ्यताओं के अनुसार चीन का कैलेंडर भी चंद्रमा गणना पर आधारित है। इसका नया साल २१ जनवरी से २१ फरवरी के बीच पड़ता है। चीनी वर्ष के नाम १२ जानवरों के नाम पर रखे गए हैं। चीनी ज्योतिष में लोगों की राशियाँ भी १२ जानवरों के नाम पर होती हैं। लिहाजा यदि किसी की बंदर राशि है और नया वर्ष भी बंदर आ रहा हो तो वह साल उस व्यक्ति के लिए विशेष तौर पर भाग्यशाली माना जाता है। 

भारत भी कैलैंडरों के मामले में कम समृद्ध नहीं है। इस समय देश में विक्रम संवत, शक संवत, हिजरी संवत, फसली संवत, बांग्ला संवत, बौद्ध संवत, जैन संवत, खालसा संवत, तमिल संवत, मलयालम संवत, तेलुगु संवत आदि तमाम साल प्रचलित हैं। इनमें से हर एक के अपने अलग-अलग नववर्ष होते हैं। देश में सर्वाधिक प्रचलित संवत विक्रम और शक संवत है। माना जाता है कि विक्रम संवत गुप्त सम्राट विक्रमादित्य ने उज्जयनी में शकों को पराजित करने की याद में शुरू किया था। यह संवत ५८ ईसा पूर्व शुरू हुआ था। विक्रम संवत चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से शुरू होता है। 

इसी समय चैत्र नवरात्र प्रारंभ होता है। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन उत्तर भारत के अलावा गुड़ी पड़वा और उगादी के रूप में भारत के विभिन्न हिस्सों में नव वर्ष मनाया जाता है। सिंधी लोग इसी दिन चेटी चंद्र के रूप में नववर्ष मनाते हैं। शक सवंत को शालीवाहन शक संवत के रूप में भी जाना जाता है। माना जाता है कि इसे शक सम्राट कनिष्क ने ७८ ई. में शुरू किया था। स्वतंत्रता के बाद भारत सरकार ने इसी शक संवत में मामूली फेरबदल करते हुए इसे राष्ट्रीय संवत के रूप में अपना लिया। राष्ट्रीय संवत का नव वर्ष २२ मार्च को होता है जबकि लीप ईयर में यह २१ मार्च होता है। 

पहली जनवरी को अब नये साल के जश्न के रुप में मनाया जाता है। एक-दूसरे की देखा-देखी यह जश्न मनाने वाले शायद ही जानते हों कि दुनिया भर में पूरे ७० नववर्ष मनाए जाते हैं। दिलचस्प बात यह है कि आज भी पूरी दुनिया कैलेण्डर प्रणाली पर एकमत नहीं हैं। इक्कीसवीं शताब्दी के वैज्ञानिक युग में इंसान अन्तरिक्ष में जा पहुँचा है, मगर कहीं सूर्य पर आधारित, कहीं चन्द्रमा पर आधारित तो कहीं सूर्य, चन्द्रमा और तारों की चाल पर धार्मिक मान्यताओं के अनुसार दुनिया में विभिन्न कैलेण्डर प्रणालियाँ लागू हैं। यही वजह है कि अकेले भारत में पूरे साल तीस अलग-अलग नव वर्ष मनाए जाते हैं। दुनिया में सर्वाधिक प्रचलित कैलेण्डर ‘ग्रेगोरियन कैलेण्डर’ है। जिसे पोप ग्रेगरी तेरह ने २४ फरवरी, १५८२ को लागू किया था। यह कैलेण्डर १५ अक्तूबर, १५८२ में शुरू हुआ। इसमें अनेक त्रुटियाँ होने के बावजूद भी कई प्राचीन कैलेण्डरों को दुनिया के विभिन्न हिस्सों में आज भी मान्यता मिली हुई हैं। 

जापानी नव वर्ष ‘गनतन-साईं’ या ‘ओषोगत्सू’ के नाम से भी जाना जाता है। महायान बौद्ध ०७ जनवरी, प्राचीन स्कॉट में ११ जनवरी, वेल्स के इवान वैली में नव वर्ष १२ जनवरी, सोवियत रूस के रुढि़वादी चर्चों, आरमेनिया और रोम में नववर्ष १४ जनवरी को होता है। वहीं सेल्टिक, कोरिया, वियतनाम, तिब्बत, लेबनान और चीन में नव वर्ष २१ जनवरी को प्रारंभ होता है। प्राचीन आयरलैंड में नववर्ष १ फरवरी, २०११ को मनाया जाता है तो प्राचीन रोम में १ मार्च, २०११ को। भारत में नानक शाही कैलेण्डर का नव वर्ष १४ मार्च से शुरू होता है। इसके अतिरिक्त ईरान, प्राचीन रूस तथा भारत में बहाई, तेलुगू तथा जमशेदी (जोरोस्ट्रियन) का नया वर्ष २१ मार्च से शुरू होता है। प्राचीन ब्रिटेन में नव वर्ष २५ मार्च को प्रारंभ होता है। 

प्राचीन फ्रांस में एक अप्रैल से अपना नया साल प्रारंभ करने की परंपरा थी। यह दिन अप्रैल फूल के रुप में भी जाना जाता है। थाईलैंड, ब र्मा, श्रीलंका, कम्बोडिया और लाओ के लोग ०७ अप्रैल को बौद्ध नववर्ष मनाते हैं। वहीं कश्मीर के लोग अप्रैल में। भारत में वैशाखी के दिन, दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों, बंगलादेश, श्रीलंका, थाईलैंड, कम्बोडिया, नेपाल, बंगाल, श्रीलंका व तमिल क्षेत्रों में, नया वर्ष १४ अप्रैल को मनाया जाता है। इसी दिन श्रीलंका का राष्ट्रीय नव वर्ष मनाया जाता है। सिखों का नया साल भी १४ अप्रैल को मनाया जाता है। बौद्ध धर्म के कुछ अनुयायी बुद्ध पूर्णिमा के दिन १७ अप्रैल को नया साल मनाते हैं। असम में नववर्ष १५ अप्रैल को, पारसी अपना नववर्ष २२ अप्रैल को, तो बेबीलोनियन नव वर्ष २४ अप्रैल से शुरू होता है। प्राचीन ग्रीक में नव वर्ष २१ जून को मनाया जाता था। प्राचीन जर्मनी में नया साल २९ जून को मनाने की परंपरा थी और प्राचीन अमेरिका में १ जुलाई को। इसी प्रकार आरमेनियन कैलेण्डर ९ जुलाई, २०११ से प्रारंभ होता है जबकि म्यांमार का नया साल २१ जुलाई से। 

--अपर्णा द्विवेदी

योग दिवस पर सद्गुरु जग्गी वासुदेव जी का विशेष लेख :योग और उसके लाभ

मैं आम तौर पर योग के लाभों के बारे में बात नहीं करता क्योंकि मैं समझता हूं कि योग के सभी महान लाभ उसकी प्रतिक्रिया हैं। शुरू में लोग योग की तरफ इसलिए आकर्षित होते हैं क्योंकि उससे विभिन्न प्रकार के स्वास्थ्य लाभ होते हैं और तनाव से मुक्ति मिलती है निश्चित रूप से शारीरिक और मानसिक लाभ हैं- लोग शारीरिक और मानसिक बदलाव का अनुभव कर सकते हैं। ऐसे कई लोग है जिन्हें अपने पुराने रोगों से चामत्कारिक रुप से मुक्ति मिली है। शान्ति, प्रसन्नता और स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से योग से निश्चित रूप से कई लाभ हैं लेकिन योग की यह विशेष प्रकृति नहीं है। योग के बारे में असली चीज यह है कि यह आपको जीवन का बड़ा अनुभव देता है और एक व्यक्ति होने के अपेक्षाकृत आप एक सार्वभौमिक प्रक्रिया के अंग बन जाते हैं। आप देखेंगे कि इससे अनोखे परिणाम आपको प्राप्त होंगे।

योग के बारे में जब पहली बार उसके भौतिक आयाम की जानकारी दी जाती है और तब यह बताया जाता है कि मानव प्रणाली इस अंतरिक्षीय ज्यामिति से कितनी भिन्न है। हम रचना की ज्यामिति की बात करते हैं। अगर आप ज्यामिति की सही जानकारी रखते हैं और उसमें प्रवीण होते हैं तब सारा टकराव समाप्त हो जाता है। आंतरिक टकराव का अर्थ होता है कि आप अपने विरुद्ध काम कर रहे हैं। यानी आप अपने आप में एक समस्या हैं। जब आप स्वयं एक समस्या हैं तब अन्य समस्याओं से आप कैसे मुकाबला करेंगे? सबकुछ तनावपूर्ण है। आप अपने जीवन में स्वयं समस्या न बनें। यदि आपके पास अन्य समस्याएं हैं तो उन पर बात करते हैं। विश्व में तमाम तरह की चुनौतियां मौजूद हैं। आप जितनी गतिविधियां करेंगे उतनी चुनौतियां आएंगी और यह सिलसिला चलता रहेगा। लेकिन आपका शरीर, मस्तिष्क, भावनाएं, ऊर्जा आपके जीवन की बाधाएं नहीं बननी चाहिए।

अगर इन सबको ठीक से दुरुस्त कर दिया जाए तो आपका शरीर और मन ऐसे-ऐसे काम करने में सक्षम हो जाएगा जिसके बारे में आपने कभी कल्पना नहीं की होगी। अचानक लोग समझने लेगेंगे कि आप महामानव बन गए हैं। अगर आप ज्यामिति से तालमेल बिठा लेते हैं तब चाहे व्यापार हो, घर हो, प्रेम हो, युद्ध हो, जो कुछ भी हो आप एक ऊंचे स्तर की कुशलता और क्षमता के साथ ये सारे काम कर पाएंगे। ऐसा इसलिए है कि चाहे चेतनावस्था हो या अवचेतनावस्था, सब ज्यामिति का काम है। आम तौर पर यह कोई चीज समझने जैसी है लेकिन सैद्धांतिक रुप से यह अस्तित्व की ज्यामिति है। सही ज्यामिति प्राप्त होने से आप सही दिशा में अग्रसर हो जाएंगे।

योग का अर्थ है जीवन की प्रणाली। इसके तहत यह समझना है कि जीवन की प्रणाली कैसे बनती है और उसका इस्तेमाल उलझन के लिए नहीं बल्कि मुक्त होने के लिए कैसे किया जा सकता है। अब शरीर को कैसे स्थिर किया जाए? शरीर को स्थिर करना सीखना आसान नहीं है। आपको याद होगा कि 70 और 80 के दशक में जब आपके घरों में टेलीविजन पहुंचा था तो आपके घर के ऊपर एल्युमीनियम का एनटीना लगा होता था। जब उसे कायदे से दुरुस्त किया जाता था तो आपके बैठक में पूरी दुनिया चली आती थी क्योंकि आपने उसे सही दिशा दे दी थी।

इसी प्रकार इस शरीर में अपार क्षमताएं हैं यदि आप इसे सही दिशा देंगे तो आप पूरे ब्रह्माण को उतार लेंगे। यही योग है। योग का अर्थ है जोड़ना। जुड़ने का मतलब है कि व्यक्ति और ब्रम्हांड के बीच का अंतर समाप्त हो जाता है। तब कुछ भी व्यक्तिगत नहीं है, कुछ भी सार्वभौमिक नहीं है, सब कुछ आप ही हैं- यानी आप योग में हैं। इसका अर्थ यह नहीं है कि आपने किसी चीज की कल्पना की बल्कि इसका अर्थ यह है कि आपने क्या अनुभव किया। अनुभव तभी होता है जब आप सही दिशा में हों, अन्यथा वह नहीं होगा। इस शरीर को स्थिर करना सीखने का मतलब आप अपने एनटीना को सही दिशा में दुरुस्त कर रहे हैं- अगर आप सही दिशा में स्थिर रहेंगे तो पूरा अस्तित्व आपके भीतर उतर आएगा। यह योग अनुभव का एक जबरदस्त उपकरण है।

जीवन मैं योग के लाभः

योग का अर्थ एक विशेष अभ्यास करना यह अपने शरीर को हिलाना डुलाना नहीं है। योग का अर्थ है अपने उच्च स्वभाव तक पहुंचने के लिए उपयोग किया गया कोई भी तरीका। आप जो टेक्नोलॉजी उपयोग में लाते हैं उसे योग कहा जाता है।

जीवन में योग क्यों आवश्यक है? निश्चित रूप से इसका शारीरिक लाभ है। यह एक व्यक्ति के लिए बहुत कुछ है। इससे व्यक्ति अपना स्वास्थ्य सुधार सकते हैं और अपने शरीर को और लचीला बना सकते है। लेकिन एक स्वस्थ्य शरीर के साथ भी जीवन में अस्थिरता बनी रहेगी। इस ग्रह पर अस्वस्थ और दयनीय लोगों से अधिक संख्या में स्वस्थ और दुःखी लोग हैं। यदि आपको बीमारी है तो कम से कम आपके पास एक अच्छा बहाना है। अधिकतर लोगों के पास तो यह भी नहीं। योग के साथ शारीरिक स्वास्थ्य और मानसिक खुशी मिलेगी। लोग सरल योग प्रक्रियाओं से अनूठा स्वास्थ्य लाभ प्राप्त कर सकते हैं लेकिन इससे जीवन में स्थिरता नहीं आती।

जबतक आप का अस्तित्व है मानव के सभी पक्षों को जाने बिना तब तक आप एक संघर्षपूर्ण सीमित जीवन जिएंगे। एक बात मानव शरीर और बुद्धि के साथ इस विश्व में आने पर आप जीवन के सभी पक्षों को ढूढ़ने में सक्षम होते हैं। यदि ऐसा नहीं होता तो व्यक्ति को कष्ट होता है क्योंकि यह शरीर तक सीमित होता है और अन्य पक्षों के अनुभवों से वंचित है। यह जीवन की प्रकृति है। आप जैसे ही इसे रोकते है यह संघर्ष करता है।

आज तंत्रिका सिद्धांत तथा आधुनिक विज्ञान जीवन के पक्षों की बात करता है। हम योग प्रणाली में हमेशा जीवन के 21 पक्षों की बात करते हैं। यदि आप अभी उपलब्ध तीन पक्षों के साथ इतना अधिक करते हैं तो आप पास 21 पक्षों के साथ जीवन में अधिक स्वतंत्रा प्राप्त करेंगे। आप आसानी से अपना जीवन से निपटलेंगे क्योंकि सभी पक्ष जीवंत हैं और आपके अनुभवों के भीतर हैं।

योगा के विषय में वास्तविक बात यह है कि योग आपको संपूर्ण समावेशी बनाता है। यह आपके जीवन के अनुभव को इतना व्यापक औऱ सम्पूर्ण समावेशी बनाता है कि आप व्यक्ति के बदले एक सार्वभौमिक प्रक्रिया हो जाते हैं जोकि प्रत्येक मनुष्य के रूप में मौलिक रूप में निहित है। आप जहां कहीं भी होंगे आप अभी जो कर रहे हैं उससे अधिक करना चाहेंगे। यह बात मायने नहीं रखती कि आपकी सोच शीर्ष पर है अथवा नीचे है फिर भी आप जो हैं उससे अधिक होना चाहते हैं। यदि थोड़ा बहुत कुछ होता है तो आप चाहते है कि कुछ और हो, कुछ और हो। यह क्या है जो आप चाहते हैं। आप सीमा रहित विस्तार चाहिते है। यह सीमा रहित विस्तार शारीरिक साधनों से नहीं हो सकता है। शारीरिक साधन एक निश्चित सीमा है। यदि आप सीमा हटाते हैं तो कुछ भी शारीरिक नहीं बचता। यह सीमाहीन्ता तभी संभावना बनती है जब एक पक्ष शरीर से बहार निकलकर आपके साथ एक जीवंत वास्तविकता बन जाता है।

यदि एक पक्ष निरंतर रूप से आपके अऩुभव में शरीर से आगे रहता है तब आप शरीर से मुक्त होते हैं और आप जीवन और मृत्यु की प्रक्रिया से मुक्त होते हैं क्योंकि यह शरीर से जुड़े हैं। स्वतंत्रता का अर्थ क्या है? सीमारहित होना और सीमारहित शारीरिक नहीं हो सकता। इस सम्पूर्ण प्रक्रिया का उद्देश्य आपके शरीर से बाहर अनुभव को लाना औऱ उसे बनाए रखना है। यदि एक बार आप इसके सम्पर्क में आते हैं तो आप एक कृति नहीं बल्कि अपने जीवन के सृजनकर्ता होते हैं।

*सदगुरू प्रख्यात योगी एवं अध्यात्म गुरु हैं। लेख में व्यक्त विचार लेखक के अपने विचार है*

सनातन धर्म में व्रत/उपवास का धार्मिक और वैज्ञानिक महत्त्व

व्रत शब्द की उत्पत्ति (वृत्त वरणे अर्थात वरण करना या चुनना) से मानी गई है, । ऋग्वेद में वृत शब्द का प्रयोग इस प्रकार हुआ है- 'संकल्प' आदेश विधि निर्दिष्ट व्यवस्था वशता आज्ञाकारिता सेवा स्वामित्व व्यवस्था निर्धारित उत्तराधिकर वृत्ति आचारिक कर्म प्रवृत्ति में संलग्नता रीति धार्मिक कार्य उपासना कर्तव्य अनुष्ठान धार्मिक तपस्या उत्तम कार्य आदि। वृत से ही व्रत की उत्पत्ति मानी गई है।

श्रद्धालु एव भक्तगण देवों के अनुग्रह की प्राप्ति के लिए अपने आचरण या भोजन को नियंत्रित करके उपवास रखते हैं। व्रत को दैवी आदेश या आचरण संबंधी नैतिक विधियों के अर्थ में लिया जाता है। ऋग्वेद में कहा गया है कि इंद्र के सहायक मित्र विष्णु के कर्मों को देखो जिनके द्वारा वह अपने व्रतों अर्थात आदेशों की रक्षा करता है।

वैदिक संहिताओं में कहीं-कहीं व्रत को किसी धार्मिक कृत्य या संकल्प संलग्न व्यक्ति के लिए व्यवस्थित किया गया है। ब्राह्मण उपनिषदों में बहुधा अधिक स्थलों पर व्रत का दो अर्थों में प्रयोग हुआ है- एक धार्मिक कृत्य या संकल्प तथा आचरण एवं भोजन संबंधी रोक के संदर्भ में और दूसरा उपवास करते समय भक्ष्य अभक्ष्य भोजन के संदर्भ में।

धर्मसिंधु ने व्रत को पूजा आदि से संबंधित धार्मिक कृत्य माना है। अग्निपुराण में कहा गया है कि व्रत करने वालों को प्रतिदिन स्नान करना चाहिए, सीमित मात्रा में भोजन करना चाहिए। इसमें होम एवं पूजा में अंतर माना गया है। विष्णु धर्मोत्तर पुराण में व्यवस्था है कि जो व्रत-उपवास करता है, उसे इष्टदेव के मंत्रों का मौन जप करना चाहिए, उनका ध्यान करना चाहिए उनकी कथाएं सुननी चाहिए और उनकी पूजा करनी चाहिए।

इसमें होम योग एवं दान के महत्व को समझाया गया है। व्रतों में कम प्रयास से अधिक फलों की प्राप्ति होती है। व्रतों में इसी लोक में रहते हुए पुण्य फल प्राप्त हो जाते हैं। व्रत कोई भी कर सकता है।

भारतवर्ष में ईसा पूर्व एवं पश्चात व्रतों की व्यवस्था प्रचलित थी। कुछ व्रत ब्रह्मचारियों के लिए और कुछ सनातनी धर्मावलंबियों के लिए निश्चित थे। कालिदास वाड़.मय मृच्छकटिक रत्नावली आदि में इसका उल्लेख है। राजा भोज के राजमार्तण्ड में 24 व्रतों का उल्लेख है। हेमादि में 700 व्रतों के नाम बताए गए हैं। गोपीनाथ कविराज ने 1622 व्रतों का उल्लेख अपने व्रतकोश में किया है।

किंतु अशौच अवस्था में व्रत नहीं करना चाहिए। जिसकी शारीरिक स्थिति ठीक न हो व्रत करने से उत्तेजना बढ़े और व्रत रखने पर व्रत भंग होने की संभावना हो उसे व्रत नहीं करना चाहिए।

व्रती में व्रत करते समय निम्नोक्त 10 गुणों का होना आवश्यक है। क्षमा, सत्य, दया, दान, शौच, इन्द्रियनिग्रह, देवपूजा, अग्निहवन, संतोष एवं अस्तेय। देवल के अनुसार ब्रह्मचर्य, शौच, सत्य एवं अमिषमर्दन नामक चार गुण होने चाहिए। व्रत के दिन मधुर वाणी का प्रयोग करना चाहिए। पतित पाखंडी तथा नास्तिकों से दूर रहना चाहिए और असत्य भाषण नहीं करना चाहिए। उसे सात्विक जीवन का पालन और प्रभु का स्मरण करना चाहिए। साथ ही कल्याणकारी भावना का पालन करना चाहिए।

जाने आखिर कैसे हैं हमारा 'नव संवत्सर' पूरे विश्व का नववर्ष


जैसे ईसा (अंग्रेजी), चीन या अरब का कैलेंडर है उसी तरह राजा विक्रमादित्य के काल में भारतीय वैज्ञानिकों ने इन सबसे पहले ही भारतीय कैलेंडर विकसित किया था। इस कैलेंडर की शुरुआत हिंदू पंचांग के अनुसार चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से मानी जाती है।

मार्च माह से ही दुनियाभर में पुराने कामकाज को समेटकर नए कामकाज की रूपरेखा तय की जाती है। इस धारणा का प्रचलन विश्व के प्रत्येक देश में आज भी जारी है। 21 मार्च को पृथ्वी सूर्य का एक चक्कर पूरा कर लेती है, उस वक्त दिन और रात बराबर होते हैं।

12 माह का एक वर्ष और 7 दिन का एक सप्ताह रखने का प्रचलन विक्रम संवत से ही शुरू हुआ। महीने का हिसाब सूर्य व चंद्रमा की गति पर रखा जाता है। विक्रम कैलेंडर की इस धारणा को यूनानियों के माध्यम से अरब और अंग्रेजों ने अपनाया। बाद में भारत के अन्य प्रांतों ने अपने-अपने कैलेंडर इसी के आधार पर विकसित किए।

प्राचीन संवत :

विक्रम संवत से पूर्व 6676 ईसवी पूर्व से शुरू हुए प्राचीन सप्तर्षि संवत को हिंदुओं का सबसे प्राचीन संवत माना जाता है, जिसकी विधिवत शुरुआत 3076 ईसवी पूर्व हुई मानी जाती है।

सप्तर्षि के बाद नंबर आता है कृष्ण के जन्म की तिथि से कृष्ण कैलेंडर का फिर कलियुग संवत का। कलियुग के प्रारंभ के साथ कलियुग संवत की 3102 ईसवी पूर्व में शुरुआत हुई थी।

विक्रम संवत :

इसे नव संवत्सर भी कहते हैं। संवत्सर के पाँच प्रकार हैं सौर, चंद्र, नक्षत्र, सावन और अधिमास। विक्रम संवत में सभी का समावेश है। इस विक्रम संवत की शुरुआत 57 ईसवी पूर्व में हुई। इसको शुरू करने वाले सम्राट विक्रमादित्य थे इसीलिए उनके नाम पर ही इस संवत का नाम है। इसके बाद 78 ईसवी में शक संवत का आरम्भ हुआ।

नव संवत्सर :

जैसा ऊपर कहा गया कि वर्ष के पाँच प्रकार होते हैं। मेष, वृषभ, मिथुन, कर्क आदि सौरवर्ष के माह हैं। यह 365 दिनों का है। इसमें वर्ष का प्रारंभ सूर्य के मेष राशि में प्रवेश से माना जाता है। फिर जब मेष राशि का पृथ्वी के आकाश में भ्रमण चक्र चलता है तब चंद्रमास के चैत्र माह की शुरुआत भी हो जाती है। सूर्य का भ्रमण इस वक्त किसी अन्य राशि में हो सकता है।

चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ आदि चंद्रवर्ष के माह हैं। चंद्र वर्ष 354 दिनों का होता है, जो चैत्र माह से शुरू होता है। चंद्र वर्ष में चंद्र की कलाओं में वृद्धि हो तो यह 13 माह का होता है। जब चंद्रमा चित्रा नक्षत्र में होकर शुक्ल प्रतिपदा के दिन से बढ़ना शुरू करता है तभी से हिंदू नववर्ष की शुरुआत मानी गई है।

सौरमास 365 दिन का और चंद्रमास 355 दिन का होने से प्रतिवर्ष 10 दिन का अंतर आ जाता है। इन दस दिनों को चंद्रमास ही माना जाता है। फिर भी ऐसे बढ़े हुए दिनों को मलमास या अधिमास कहते हैं।

लगभग 27 दिनों का एक नक्षत्रमास होता है। इन्हें चित्रा, स्वाति, विशाखा, अनुराधा आदि कहा जाता है। सावन वर्ष 360 दिनों का होता है। इसमें एक माह की अवधि पूरे तीस दिन की होती है।

नववर्ष की शुरुआत का महत्व:

नववर्ष को भारत के प्रांतों में अलग-अलग तिथियों के अनुसार मनाया जाता है। ये सभी महत्वपूर्ण तिथियाँ मार्च और अप्रैल के महीने में आती हैं। इस नववर्ष को प्रत्येक प्रांत में अलग-अलग नामों से जाना जाता है। फिर भी पूरा देश चैत्र माह से ही नववर्ष की शुरुआत मानता है और इसे नव संवत्सर के रूप में जाना जाता है। गुड़ी पड़वा, होला मोहल्ला, युगादि, विशु, वैशाखी, कश्मीरी नवरेह, उगाडी, चेटीचंड, चित्रैय तिरुविजा आदि सभी की तिथि इस नव संवत्सर के आसपास ही आती है।

इस विक्रम संवत में नववर्ष की शुरुआत चंद्रमास के चैत्र माह के उस दिन से होती है जिस दिन ब्रह्म पुराण अनुसार ब्रह्मा ने सृष्टि रचना की शुरुआत की थी। इसी दिन से सतयुग की शुरुआत भी मानी जाती है। इसी दिन भगवान विष्णु ने मत्स्य अवतार लिया था। इसी दिन से नवरात्र की शुरुआत भी मानी जाती है। इसी दिन को भगवान राम का राज्याभिषेक हुआ था और पूरे अयोध्या नगर में विजय पताका फहराई गई थी। इसी दिन से रात्रि की अपेक्षा दिन बड़ा होने लगता है।

ज्योतिषियों के अनुसार इसी दिन से चैत्री पंचांग का आरम्भ माना जाता है, क्योंकि चैत्र मास की पूर्णिमा का अंत चित्रा नक्षत्र में होने से इस चैत्र मास को नववर्ष का प्रथम दिन माना जाता है।

नववर्ष मनाने की परंपरा :

रात्रि के अंधकार में नववर्ष का स्वागत नहीं होता। नया वर्ष सूरज की पहली किरण का स्वागत करके मनाया जाता है। नववर्ष के ब्रह्ममुहूर्त में उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदि से घर में सुगंधित वातावरण कर दिया जाता है। घर को ध्वज, पताका और तोरण से सजाया जाता है।

ब्राह्मण, कन्या, गाय, कौआ और कुत्ते को भोजन कराया जाता है। फिर सभी एक-दूसरे को नववर्ष की बधाई देते हैं। एक दूसरे को तिलक लगाते हैं। मिठाइयाँ बाँटते हैं। नए संकल्प लिए जाते हैं।

Vedic History of Lithuania Country

If you were to travel to Lithuania you might encounter some traditional houses adorned with the motif of two horse heads. You might take this as a simple design but it is in fact a small clue to Lithuania's deep and ancient Vedic past.

Traditionally, the Vedic peoples of Lithuania worshipped the Ašvieniai, the divine horse twins, related to the goddess Ūsinis. They are said to pull the Sun Chariot through the sky. The Lithuanian people continue to adorn their roof tops with the symbol of the divine horse twins in order to receive protection for the household.

In India the complete Vedic tradition has been preserved. There the divine horse twins are known as the Ashvins, the children of the Sun god Surya, who are summoned by the goddess Ushas (morning dawn) and appear as the morning and evening sunlight. They are often known as Nasatya (Kind, Helpful) and Dasra (Enlightened Giving). They are practitioners of Ayurveda as the doctors of the devas (demigods), and it is for this reason that people adorn their roofs with their image - so that the residing family may remain healthy. They are most notable for granting the divine twins of King Pandu - Nakula and Sahadev, who along with Yudhisthira, Bhima, and Arjuna made up the Pandavas of the Mahabharata.

Lithuanian is very archaic and has preserved linguistically a great deal from Sanskrit, the original Mother Language of Europe. Below are a few examples of the linguistic similarities:

Asva (Lithuanian)=Ashva (Sanskrit) meaning 'horse'
Dievas (Lithuanian)=Devas (Sanskrit) meaning 'gods', 'the shining ones';
Dumas (Lithuanian)=Dhumas (Sanskrit) meaning 'smoke'
Sunus (Lithuanian)=Sunus (Sanskrit) meaning 'son'
Vyras (Lithuanian)=Viras (Sanskrit) meaning 'man'
Padas (Lithuanian)=Padas (Sanskrit) meaning 'sole of the foot'
Ugnis (Lithuanian)=Agnis (Sanskrit) meaning 'fire'
Vilkas (Lithuanian)=Vrkas (Sanskrit) meaning 'wolf'
Ratas (Lithuanian)=Rathas (Sanskrit) meaning 'carriage'
Senis (Lithuanian)=Sanas (Sanskrit) meaning 'old'
Dantis (Lithuanian)=Dantas (Sanskrit) meaning 'teeth'
Naktis (Lithuanian)=Naktis (Sanskrit) meaning 'night'

In the Anglo-Saxon tradition also, it is said that two German brothers Hengist ("Stallion") and Horsa ("Horse") led the armies that conquered Britain. Many believe this is a continuation of the original tradition of the Vedic horse twins. Similar to Lithuania, you will find the same tradition of horse-headed gables on roofs throughout Germany in honor of Hengist and Horsa.

So the next time you travel through Europe and see these horse gabled roofs, smile and realize their connection to Europe's ancient Vedic past. 

भगवन शंकर द्वारा उपदिष्ट प्रभात -मंगल

सर्व प्रथम ब्राह्ममुहूर्त में उठकर भगवन शंकर द्वारा उपदिष्ट प्रभात -मंगल का स्मरण करना चाहिये! उसके द्वारा-देवग्रहादि-स्मरण से दिन मंगलमय बीतता है और दु:स्वप्न का फल शांत हो जाता है! वह सुप्रभात स्तोत्र इस प्रकार है:

ब्रह्मा मुरारीस्त्रिपुरान्ताकारी भानु: शशी भूसुतो बुद्धश्च! 
गुरुश्च सह भानुजेन कुर्वन्तु सर्वे मम सुप्रभातम!! 
सनत्कुमार: सनक: सनन्दन: सनातनोsप्यासुरिपिन्गलो च! 
सप्त स्वरा: सप्त रसातालाश्च कुर्वंतो सर्वे सुप्रभातम!! 
सप्तार्णवा: सप्तकुलाचलाश्च सप्तर्षयो द्वीपवराश्च सप्त ! 
भूरादिकृत्वा भुवनानि सप्त कुर्वन्तु सर्वे मम सु प्रभातम!! 

इस प्रकार परम पवित्र सुप्रभात के प्रात:काल भक्तिपूर्वक उच्चारण करने से दुस्वप्न का अनिष्ट का फल नष्ट होकर सुस्वप्न फलरूप में प्राप्त होता है! सुप्रभात का स्मरण कर पृथ्वी का स्पर्शपूर्वक प्रणाम करके शय्या त्याग करना चाहिये! 

मन्त्र इस प्रकार है:

समुर्दवसने देवी पर्वतस्तनमंडले! 
विष्णुपत्नी नमस्तुभ्यं पादस्पर्श क्षमस्व में!! 

श्री कालिका हृदय स्तोत्रम

!! अथ श्री कालिका हृदय स्तोत्रम !!

**********************************
हं हं हं हंस हँसी स्मित कह - कह चामुक्त- घोराटट-हासा!!
खं खं खं खडग-हस्ते त्रिभुवन-निलये कालिका काल-धारी!!१!!
रं रं रं रंग-रंगी प्रमुदित वदने पिंग-केशी श्माशाने !
यं रं लं तापनीये भाकुटिघट घटाटोप टंकार जापे!!२!!
हं हं हंकार -नादं नर-पिशित-मुखी संघानी साधु-देवी!
ह्रीं ह्रीं कुष्मांड-भुंडी वर वर ज्वलिनी पिंग-केशी कृशांगी !!३!!
खं खं खं भूत-नाथे कीलि कीलि किलिके एहि एहि प्रचंडे !
ह्रूं ह्रूं ह्रुं भूत नाथे सुर गण नमिते मातरम्बे नमस्ते!!४!!
भां भां भां भाव भावैर्भय हन हानितं भुक्ति मुक्ति प्रदात्री!
भीं भीं भीं भीमकाक्षिर्गुण गुणित गुहावास भोगी स भोगी !!५!!
भूं भूं भूं भूमि कम्पे प्रलय च निरते तारयन्तं स्व नेत्रे!
भें भें भें भेदनीये हरतु मम भयं कालिके! त्वां नमस्ते!!६!!
====================================
!! अथ फलश्रुति:!! 
आयु: श्री वर्द्धनीये विपुल रिपु हरे सर्व सौभाग्य हेतु:!!
श्रीकाली शत्रु नाशे सकल सुख करे सर्व कल्याण मूले!!७!!
भक्त्या स्तोत्रं त्रि-संध्यं यदि जपति पुमानाशु सिद्धि लभन्ते!
भूत प्रेतादि रण्ये त्रिभुवन वशिनी रूपिणी भूति युक्ते!!८!!
!! श्रीकाली तंत्रे कालिका हृदय स्तोत्रं सम्पूर्णम !! 

Proof of Jesus Christ Was Buried In Kashmir, Bharat (India)


The birthday of Jesus Christ, who many believe is the son of God and the Savior, is celebrated by most Christians around the world on Dec. 25. However, there exists many mysteries and contradictions regarding the biography of the historic Jesus. Among the most fascinating and controversial parts of his life have to do with what he did and where he went during his adolescence and early manhood -- roughly between the ages of 13 and 30 -- i.e., the "lost years" (which the New Testament completely omits).

Some scholars believe that Jesus went eastward along the legendary Silk Road route to present day India, Tibet and China and immersed himself in the teachings of Hinduism and Buddhism. Some even think that he died in what is now Kashmir, the mountainous province in the extreme north of India, and was even buried there.


Photo of the Tomb of Jesus Christ Taken Around 1930

The Navhind Times, an English-language newspaper published in the western Indian state of Goa, reported earlier this year that some scholars in India believe that Jesus, during his lengthy period of time in Asia, visited and studied in Hindu temples in Puri and Banaras and in Buddhist monasteries in Tibet -- all of which solidified his philosophy of non-violence. In addition, the Times claimed, Jesus may have even met some well-known Indian historical figures from that period, including Raja Gopananda of Kashmir and King Shalivahana.

The theory that Jesus learned ancient wisdom in India and the East contends that when he was about 30, he returned to his native land of Judea and began his public mission of preaching. Still, a smaller segment of those who believe Jesus spent many years in India allege he never returned to the Middle East, but died in Kashmir and is buried in the Roza Bal shrine in the city of Srinagar. Still others think he survived the crucifixion by the Romans and somehow escaped back to Kashmir (a distance of at least 2,500 miles) along with his mother Mary and a handful of followers.


A stone containing an engraving of the feet of Jesus Christ inside
the tomb, showing crucifixion marks on the soles of the feet.


A plaster mold showing the stone engraving.

According to the Roza Bal theory, Jesus lived until he was 80 years old in Kashmir, where got married and fathered several children. The Bible declared that Jesus ascended to heaven -- Kashmir is known as "heaven on earth." Moreover, many Kashmiris believe they are the descendants of one of the lost 10 tribes of Israel who fled the Assyrian occupation (suggesting that Jesus would seek refuge among his own people).

According to a documentary produced by the government of India called “The Roza Bal Shrine of Srinagar,” the shrine is the tomb of a man named Yuza Asaf, who is actually Jesus Christ or Nazareth, the prophet to the Children of Israel. Upon arriving in India, the teenaged Jesus apparently traveled through Punjab, Rajasthan, and lived in Jagannath Puri, Rajgriha and the Himalayan regions. The film claims that ancient texts in Arabic, Persian and Sanskrit back up this tale.

If these account are true, it would likely destroy the very foundations of Christian beliefs (not surprisingly, most Christian scholars and adherents utterly reject these theories). The Times cautioned, moreover, that there is no concrete incontrovertible evidence to validate these assumptions. Among other things, it is inconceivable that Jesus would cowardly flee his homeland especially after he ordered his disciples to preach the concepts of love and salvation.


The burial chamber of the body of Christ.

In an interview with TombofJesus.com, Yashendra Prasad, the man who wrote and directed the documentary “Roza Bal Shrine of Srinagar,” said that the Indian government has taken a neutral view over the issue of Christ in Kashmir. “[The Indian government] does not want [the] flaring up of any conflict on this issue,” Prasad said. “Personally, I would like the government to be proactive to get scientific investigations, like DNA testing of the tomb, done. However, the environment has to be amicable for this. There are elements in the world, as well as in Kashmir, who do not want this. They do not want to allow scientific investigation at Roza Bal.”

Indeed, while the Ahmadiyya Muslim community claim that Jesus (a revered prophet in Islam) is buried in Roza Bal, most Muslims think this belief is blasphemy. Nonetheless, the Roza Bal shrine is a popular destination for both tourists and even some Christian pilgrims. BBC described the shrine as a “modest stone building with a traditional Kashmiri multi-tiered sloping roof.”

A caretaker of the shrine, who rejects the notion that Jesus is buried there, complained to the BBC: "It's a story spread by local shopkeepers, just because some crazy professor said it was Jesus's tomb. They thought it would be good for business. Tourists would come, after all these years of violence. And then it got into the Lonely Planet [tourist guidebook], and too many people started coming.”

The mystery will likely never be resolved.


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5,000 Year Old Shiva Linga Found at Harappa


In 1940, archaeologist M.S. Vats discovered three Shiva Lingas at Harappa, dating more than 5,000 years old. This rare archival photo shows that ancient Shiva Linga as it was being excavated from the Harappa site.

20 Divine Pictures of The Universal Destruction - Lord Nataraja


Nataraja is the form of Lord Shiva as the Lord who dances at the time of universal destruction. The dance of Shiva in Tillai, the traditional name for Chidambaram, forms the motif for all the depictions of Shiva as Nataraja. He is also known as "Sabesan" which splits as "Sabayil aadum eesan" in Tamil which means "The Lord who dances on the dais". The form is present in most Shiva temples in South India, and is the prime deity in the famous Thillai Nataraja Temple at Chidambaram. The sculpture is usually made in bronze, with Shiva dancing in an aureole of flames, lifting his left leg (or in rare cases, the right leg) and balancing over a demon or dwarf (Apasmara) who symbolizes ignorance. It is a well known sculptural symbol in India and popularly used as a symbol of Indian culture.


The two most common forms of Shiva's dance are the Lasya (the gentle form of dance), associated with the creation of the world, and the Tandava (the violent and dangerous dance), associated with the destruction of weary worldviews – weary perspectives and lifestyles. In essence, the Lasya and the Tandava are just two aspects of Shiva's nature; for he destroys in order to create, tearing down to build again.