लोहड़ी की कहानी और लोहड़ी के लोकगीत

सुंदरी-मातृ-विहीन थी, उसके बाप का साया भी उसके सिर पर नहीं था। चाचा जमींदार था। इलाके में से अकबर बादशाह गुजरने वाला था, जमींदारों ने फैसला किया कि सुंदरी को बादशाह के सामने पेश किया जाए। गांव की सबसे सुंदर (लाल पटाखा) और सबसे गरीब (फटे सालू वाली) लड़की की रक्षा करने वालाकौन बेचारा था ? बात दुल्ला भट्टी तक पहुंचाई गई। दुल्ला दीन-दुखी का हितैषी था, उसने फौरन अपनी बेटी की तरह सुंदरी की शादी रचा डाली। जल्दी-जल्दी में शादी की धूमधाम का इंतजाम भी हो सका।

‘सेर शक्कर’ से ही शादी का शगुन किया गया। लेकिन उसने ‘चूरी’ कूटने वाले जमींदारों की खूब दुर्गति बनाई।

इस मुसीबत की घडी में दुल्ला भट्टी ने ब्राह्मण की मदद की और लडके वालों को मना कर एक जंगल में आग जला कर सुंदरी और मुंदरी का व्याह करवाया। दुल्ले ने खुद ही उन दोनों का कन्यादान किया। कहते हैं दुल्ले ने शगुन के रूप में उनको शक्कर दी थी। इसी कथा की हमायत करता लोहड़ी का यह गीत है, जिसे लोहड़ी के दिन गाया जाता है


ਸੁੰਦਰ ਮੁੰਦਰੀਏ, ਹੋ
ਤੇਰਾ ਕੋਣ ਵਿਚਾਰਾ ਹੋ
ਦ੍ਲਹਾ ਭੱਟੀ ਵਾਲਾ ਹੋ
ਦੂਲ੍ਹੇ ਦੀ ਧੀ ਵਿਆਹੀ ਹੋ
ਸੇਰ ਸੱਕਰ ਆਈ ਹੋ
ਕੁੜੀ ਦੇ ਬੋਝੇ ਪਾਈ ਹੋ
ਕੁੜੀ ਦਾ ਲਾਲ ਪਟਾਕਾ ਹੋ
ਕੁੜੀ ਦਾ ਸਾਲੂ ਪਾੱਟਾ ਹੋ
ਸਾਲੂ ਕੋਣ ਸਮੇਟੇ ਹੋ
ਚਾਚਾ ਗਾਲੀ ਦੇਸੇ ਹੋ
ਚਾਚੇ ਚੂਰੀ ਕੁਟੀ ਹੋ
ਜਿਮਿੰਦਾਰਾ ਲੂਟੀ ਹੋ
ਜਿਮੀਂਦਾਰ ਸਦਾਏ ਹੋ
ਗਿੰਨ ਗਿੰਨ ਪੋਲੇ ਲਾਏ ਹੋ
ਬੜੇ ਭੋਲੇ ਆਏ ਹੋ
ਇਕ ਭੋਲਾ ਰਹੀ ਗਯਾ
ਸਿਪਾਹੀ ਫੜ ਕੇ ਲੈ ਗਯਾ
ਸਿਪਾਹੀ ਨੇ ਮਾਰੀ ਈਟ
ਭਾਵੇਂ ਰੋ ਤੇ ਭਾਵੇਂ ਪਿਟ
ਸਾੰਨੂ ਦੇ ਦੇ ਲੋਹਰੀ ਤੇਰੀ ਜੀਵੇ ਜੋੜੀ
ਸਾੰਨੂ ਦੇ ਦੇ ਲੋਹਰੀ ਤੇਰੀ ਜੀਵੇ ਜੋੜੀ
ਸਾੰਨੂ ਦੇ ਦੇ ਲੋਹਰੀ ਤੇਰੀ ਜੀਵੇ ਜੋੜੀ

ਹੁਣ ਇਹੀ ਗੀਤ ਹਿੰਦੀ ਵਿਚ ਪੜੋ...

अब यही गीत हिंदी में...

सुंदर मुंदरिये, हो
तेरा कौन विचारा हो
दुल्ला भट्टी वाला, हो
दुल्ले दी धी ब्याही, हो
सेर शक्कर आई, हो
कुड़ी दे बोझे पाई, हो
कुड़ी दा लाल पटाका, हो
कुड़ी दा सालू पाटा, हो
सालू कौन समेटे, हो
चाचा गाली देसे, हो
चाचे चूरी कुट्टी, हो
जिमींदारां लुट्टी, हो
जिमींदार सदाये, हो
गिन-गिन पौले लाये, हो।
बड़े भोले आये हो
एक भोला रह गया
सिपाही पकड़ के ले गये
सिपाही ने मारी ईंट
चाहे रो या चाहे पिट
सानु दे दे लोहड़ी ,तुहाडी जीवे जोड़ी
सानु दे दे लोहड़ी ,तुहाडी जीवे जोड़ी
सानु दे दे लोहड़ी ,तुहाडी जीवे जोड़ी

पंजाब में लोहड़ी त्यौहार आने के कई दिन पहले युवा लड़के-लड़कियां द्वार द्वार पर जा कर गाना गा गा कर लकड़ियाँ तथा मेवा मांग कर इकट्ठा कर लोहड़ी की रात आग जला कर नाचते गातें व फल मेवा खाते हैं।

कंडा कंडा नी लकडियो कंडा सी
इस कंडे दे नाल कलीरा सी
जुग जीवे नी भाबो तेरा वीरा सी,
पा माई पा, काले कुत्ते नू वी पा
कला कुत्ता दवे वदायइयाँ,
तेरियां जीवन मझियाँ गईयाँ,
मझियाँ गईयाँ दित्ता दुध,
तेरे जीवन सके पुत्त,
सक्के पुत्तां दी वदाई,
वोटी छम छम करदी आई।

दुल्ला भट्टी की जुल्म के खिलाफ मानवता की सेवा को आज भी लोग याद करते हैं और उस रात को लोहड़ी के रूप में सत्य और साहस की जुल्म पर जीत के तौर पर मनाते हैं। इस त्योहार का सबंध फसल से भी है, इस समय गेहूँ और सरसों की फसलें अपने यौवन पर होती हैं, खेतों में गेहुँ, छोले और सरसों जैसी फसलें लहराती हैं।

5 comments:

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

बहुत सुंदर पोस्ट..... लोहड़ी और सक्रांति की हार्दिक शुभकामनायें ......

चैतन्य शर्मा said...

सक्रांति ...लोहड़ी और पोंगल....हमारे प्यारे-प्यारे त्योंहारों की शुभकामनायें आपको भी .....

डॉ. नूतन डिमरी गैरोला- नीति said...

अच्छी पोस्ट है.. सुन्दर और जानकरी युक्त .. आज चर्चामंच पर आपकी पोस्ट है...धन्यवाद ...

http://charchamanch.uchcharan.com/2011/01/blog-post_14.html

कविता रावत said...

बहुत अच्छी रोचक जानकारी प्रस्तुति हेतु धन्यवाद
लोहड़ी, मकर संक्रान्ति व उत्तरायणी की हार्दिक शुभकामनायें

मंगलमय said...

बचपन में हम लोहड़ी से एक सप्ताह पहले ही लोहड़ी के लिए ईंधन इकट्ठा करने के लिए गलियों में निकल पड़ते थे और यह गीत गाते थे...

पा नी माई पाथी
तेरा पुट चढूगा हाथी
हाथी उत्ते जौं
तेरे पुत्त पोत्रे नौं
नौंवां दी कमाई
तेरी झोली विच पाई
टेर नी माँ टेर नी
लाल चरखा फेर नी
बुड्ढी साँस लैंदी है
उत्तों रात पैंदी है
अन्दर बट्टे ना खड्काओ
सान्नू दूरों ना डराओ
चारक दाने खिल्लां दे
पाथी लैके हिल्लांगे
कोठे उत्ते मोर
सान्नू पाथी देके टोर