पारद शिवलिंग:अनुभूत प्रयोग और उपासना विधि...



करोड़ो शिवलिंगों के पूजन से जो फल  प्राप्त होता है,उससे भी कई करोर गुना अधिक फल पारद  शिवलिंग की पूजा और उसके दर्शन मात्र से ही प्राप्त हो जाता है |पारद शिवलिंग के स्पर्श मात्र से ही मोक्ष की प्राप्ति होती है|


पारद की उत्पत्ति भोलेनाथ शंकर के वीर्य से हुई है |इस पारद की प्रशंसा में देवतुलय मनीषियों,मह ऋषियों और रस सिद्ध आचार्यों ने साठ से भी अधिक दुर्लभ ग्रंथों की रचना की है |भगवान भोलेनाथ महादेव के शरीर से उत्पन्न हुए इस श्रेष्ठं वीर्य रस पारद की तुलना ब्रह्माण्ड के किसी भी पदार्थ से नही की जा सकती| पारद शब्द की व्याख्या करें तो

प - विष्णु


अ -कालिका 


र-शिव तथा

द-ब्रह्मा के बीजाक्षर 


आश्चर्यजनक चमत्कारिक तथा सिधिप्रदायक पदार्थों में पारद शिवलिंग का विशेष महत्व है|


भगवान शंकर को पारा अत्यधिक पसंद है तथा रसराज पारद भोले बाबा का शक्ति रुपी विग्रह होने के कारण ही समस्त सुरासुर तथा देवी देवताओं के लिए अनुकार्निये एवं वन्द्निये है |पारद शिवलिंग के दर्शन एवं पूजनादि करने से मनुष्य को अति आनंद की अनुभूति होती है |और समस्त सांसारिक बाधाओं से भी मुक्ति मिलती है|


जो मनुष्य पारदेश्वर की भक्तिपूर्वक पूजा-अभिषेक तथा नित्य दर्शन करता है,उसे तीनो लोकों में स्थित समस्त ज्योतिर्लिंगो एवं शिवलिंगों के पूजन का फल मिलता है |इस अद्भुत तथा दिव्य पारद शिवलिंग का मात्र नित्य दर्शन करना ही महा पुन्य्दाई है|


प्रदोष व्रत काल और श्रावण मॉस में प्रत्येक सोमवार को प्रात इस दिव्य पारद शिवलिंग की विशेष पूजा तथा लिंगाभिशेक करने से समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं|जहां पर्द्लिंग है वहाँ पर रिधि-सीधी,शुभ-लाभ,सुख-शान्ति,धन-सम्पति,कीर्ति और स्वयम भू महालक्ष्मी का स्थाई निवास होता है|वहीं पर समस्त देवी देवता और सीढियों का वास होता है|यह अलोकिक पारद शिवलिंग जिस किसी भी घर,ऑफिस दूकान दुकान ,फेक्टरी,व्यापर स्थल अथवा पूजा स्थल में स्थापित होता है और प्रतिदिन इसकी पूजा तथा अभिषेक किया जाता है,उस स्थान से अनिष्ट-आपदाएं,रोग-दोष,द्वेष-क्लेश,दरिद्रता और भुत-प्रेतादि ऊपरी बाधाएं स्वत; ही दूर रहती हैं|उस जगह पर किसी भी प्रकार के तांत्रिक प्रयोगों का  दुष्प्रभाव कतई भी नहीं पङ सकता है|


पारद शिवलिंग के शिवलिंग के अनुभूत प्रयोग:



पारद शिवलिंग का महत्व इसकी विशेषताओं तथा इसके प्रयोगों के विषय में यदि विस्तारपूर्वक पूर्वक वर्णन किया जाये तो सकता है की एक विशाल ग्रन्थ तियार हो जाये| |तथापि कुछेक अनुभूत प्रयोगों का संक्षिप्त वर्णन यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है|


विवाह बाधा निवारण हेतु प्रयोग:


विवाह न हो पाने अथवा विवाह में अनावश्यक विलम्ब या बाधा उत्पन्न होने की समस्या हरेक परिवार में बनी हुई है|घर में अविवाहित लड़का अथवा लड़की के विवाह बाधा निवारणार्थ मंत्र्सिध चैतन्य पार्द्लिंग को घर के पूजा-स्थल में विधिपूर्वक स्थापित करके अविवाहित जातक शीघ्र विवाह की कामना के साथ इकीस दिनों तक पारद शिवलिंग की पूजा उपासना,अराधना तथा अभिषेक करते हुए श्र्धपूर्व्क साधना करे तो चमत्कारी रूप से विवाह सम्बन्ध तय हो सकता है|

तांत्रिक दोष निवारण हेतु उपयोग:

कई बार ईष्र्या,लोभवश अथवा अन्य किसी दुर्भावना वश कोई शत्रु टोना-टोटका करा देता है,जिसके कारण जन-तन,धन,हानि आर्थिक-मानसिक तथा शारीरिक पीड़ा और मृत्यु तुली कष्टों का सामना करते हुए जीवन नर्क समान हो जाता है|यदि आपको भी लगता है की  कुछ ऐसा आपके साथ भी हुआ है तो आप शीघ्र ही मन्त्र सिद्ध,चैतन्य,प्रबल,उर्जावान पारद शिवलिंग को घर में स्थापित करके योग्य ब्राह्मणों से उस पर रुद्राभिषेक करवाकर नित्य पूजा-उपासना करना प्रारम्भ कर देवें|

रोग मुक्ति हेतु प्रयोग:

यदि कोई व्यक्ति किसी भी प्रकार के गंभीर रोग से पीड़ित हो उस पर किसी भी प्रकार की चिकित्सा का कोई असर नही हो रहा हो तो ऐसे में चिकित्साकिय उपचार के अतिरिक्त सिद्ध पारद शिवलिंग की साधना स्वयं करे अथवा योग्य विद्वान से करवाए तथा पारदेश्वर पर अभिषेक किया हुआ जल रोगी को एक-एक चम्मच दिन में तीन बार पिलाये तो आश्चर्यजनक रूप से रोगी पर स्वस्थता के लक्षण नज़र आने लग जाते है|

वास्तुदोष निवारक प्रयोग :

यदि किसी घर,दूकान,फैक्ट्री,ऑफिस,प्लाट,कारखाना अथवा व्यापार स्थल में वास्तुदोष हो तथा उसके निवारण हेतु तोड़-फोड किया जाना ही एकमात्र उपाय हो तो ऐसे में किसी भी प्रकार से मंत्र्सिध चैतन्य पारद शिवलिंग कहीं से प्राप्त करके उस स्थान पर विधिपूर्वक स्थापित करके नित्य पूजा अभिषेक करें|तो उस स्थान का वास्तुदोष सदैव के लिए समाप्त हो जाता है|

पारद शिवलिंग की उपासना विधि:

पारदेश्वर शिवलिंग की पूजन विधि सहज और सरल होने के साथ-साथ शीघ्र फलदायी भी है |
किसी भी सोमवार अथवा गुरूवार के दिन किसी पवित्र स्थान अथवा पूजा स्थल पर पारद शिवलिंग की स्थापित करके जल,दुग्ध था पंचाम्रत से स्नानादि करवाकर पंचोपचार पूजन करके श्रद्धापूर्वक बिल्वपत्र,आक,धतुरा,इत्यादि चरावें था प्रतिदिन मंत्र्सिध चेतन्य रुद्राक्ष माला से महा मृतुन्जय का १०८ दफा जप करें|
कुछ ही दिनों में आश्चर्य रूप से चमत्कारिक अनुभूति होने लगेगी|

kaal Sarp yog ke upaye...



आपकी कुण्डली में कालसर्प योग है इस बात का पता कुण्डली में ग्रहों की स्थिति को देखकर पता चलता है लेकिन कई बार जन्म समय एवं तिथि का सही ज्ञान नहीं होने पर कुण्डली ग़लत हो जाती है. इस तरह की स्थिति होने पर कालसर्प योग आपकी कुण्डली में है या नहीं इसका पता कुछ विशेष लक्षणो से जाना जा सकता है.|
कुण्डली में राहु और केतु की उपस्थिति के अनुसार व्यक्ति को कालसर्प योग (Kalsarp Dosha) लगता है. कालसर्प योग को अत्यंत अशुभ योग माना गया है. ज्योतिषशास्त्र के अनुसार यह योग जिस व्यक्ति की कुण्डली में होता है उसका पतन होता है.यह इस योग का एक पक्ष है
जबकि दूसरा पक्ष यह भी है कि यह योग व्यक्ति को अपने क्षेत्र में सर्वक्षेष्ठ बनता है।
कालसर्प योग (Kalsarp Yoga) का प्राचीन ज्योतिषीय ग्रंथों में विशेष जिक्र नहीं आया है.तकरीबन सौ वर्ष पूर्व ज्योर्तिविदों ने इस योग को ढूंढ़ा.इस योग को हर प्रकार से पीड़ादायक और कष्टकारी बताया गया.आज बहुत से ज्योतिषी इस योग के दुष्प्रभाव का भय दिखाकर लोगों से काफी धन खर्च कराते हैं.ग्रहों की पीड़ा से बचने के लिए लोग खुशी खुशी धन खर्च भी करते हैं.परंतु सच्चाई यह है कि जैसे शनि महाराज सदा पीड़ा दायक नहीं होते उसी प्रकार राहु और केतु द्वारा निर्मित कालसर्प योग हमेंशा अशुभ फल ही नहीं देते.
अगर आपकी कुण्डली में कालसर्प योग (Kalsarp Yoga) है और इसके कारण आप भयभीत हैं तो इस भय को मन से निकाल दीजिए.कालसर्प योग से भयाक्रात होने की आवश्यक्ता नहीं है क्योंकि ऐसे कई उदाहरण हैं जो यह प्रमाणित करते हैं कि इस योग ने व्यक्तियों को सफलता की ऊँचाईयों पर पहुंचाया है.कालसर्प योग से ग्रसित होने के बावजूद बुलंदियों पर पहुंचने वाले कई जाने माने नाम हैं जैसे धीरू भाई अम्बानी, सचिन तेंदुलकर, ऋषिकेश मुखर्जी, पं. जवाहरलाल नेहरू, लता मंगेशकर आदि|

कालसर्प के लक्षण 
कालसर्प योग से पीड़ित होने पर स्वप्न में मरे हुए लोग आते हैं. मृतकों में अधिकांशत परिवार के ही लोग होते हैं. इस योग से प्रभावित व्यक्ति को सपने में अपने घर पर परछाई दिखाई देती है. व्यक्ति को ऐसा लगता है मानो कोई उसका शरीर और गला दबा रहा है. सपने में नदी, तालाब, समुद्र आदि दिखाई देना भी कालसर्प योग से पीड़ित होने के लक्षण हैं. 

ज्योतिषशास्त्र के अनुसार इस योग से प्रभावित व्यक्ति समाज एवं परिवार के प्रति समर्पित होता है वे अपनी निजी इच्छा को प्रकट नहीं करते और न ही उन्हें अपने सुख से अधिक मतलब होता है. इनका जीवन संघर्ष से भरा होता है. बीमारी या कष्ट की स्थिति में अकेलापन महसूस होना और जीवन बेकार लगना ये सभी इस योग के लक्षण हैं. 

इस प्रकार की स्थिति का सामना अगर आपको करना पड़ रहा है तो संभव है कि आप इस योग से पीड़ित हैं. इस योग की पीड़ा को कम करने के लिए इसका उपचार कराएं. 

कालसर्प योग कारण 
कर्म फल की बात सभी शास्त्र और धर्म में बताया गया है. हम जैसा कर्म करते है उसी के अनुरूप हमें फल मिलता है. कालसर्प योग के पीछे भी यही मान्यता और धारणा है. मान्यताओं के अनुसार कालसर्प योग उस व्यक्ति की कुण्डली में बनता है जिसने पूर्व जन्म में सांप को मारा हो या किसी बेकसुर जीव को इतना सताया हो कि उसकी मृत्यु हो गयी हो. इसके अलावा यह भी माना जाता है कि जब व्यक्ति की प्रबल इच्छा अधूरी रह जाती है तब व्यक्ति अपनी इच्छाओं को पूरा करने के लिए पुनर्जन्म लेता है और ऐसे व्यक्ति को भी इस योग का सामना करना होता है. |

वैदिक ज्योतिष के समान लाल किताब भी भविष्य जानने की एक विधा है.लाल किताब में ग्रहों के योग और उनके फल के सम्बन्ध में अपनी मान्यताएं है.ज्योतिष की इस विधा में भी कालसर्प है और इसका फल एवं उपाय है लेकिन कालसर्प को देखने का नजरिया अलग है.आइये हम भी लाल किताब से कालसर्प को जानें.

लाल किताब (Lalkitab - The astrology wonderbook) कालसर्प को दोष मानता है बल्कि इसे योग मानता है.राहु और केतु विभिन्न खानों में बैठकर 12 तरह के विशेष योग बनाते हैं.जिस प्रकार अन्य ग्रह अलग अलग खानो में बैठकर शुभ और अशुभ फल देते हैं उसी प्रकार राहु केतु भी शुभ और अशुभ दोनों प्रकार के फल देते हैं.ज्योतिष की इस विधा में राहु को सांप का सिर और केतु को उसका दुम माना गया है.कुण्डली में सूर्य से लेकर शनि तक सभी सात ग्रह जब राहु और केतु के बीच होते हैं तब कालसर्प योग बनता है.

लाल किताब के अनुसार जब मंगल और शनि जन्म कुण्डली में एक साथ हों अथवा द्वादश में और चन्द्रमा चतुर्थ भाव में तब राहु अशुभ फल नहीं देता है एवं कालसर्प बाधक नहीं होता है.राहु के अशुभ होने पर दक्षिण की ओर अगर घर का मुख्यद्वारा हो तो आर्थिक परेशानी बनी रहती है.आर्थिक नुकसान और कई प्रकार की उलझनें एक के बाद एक आती रहती है.कालसर्प में इस प्रकार की स्थिति में लाल किताब यह उपाय बताता है कि व्यक्ति को मसूर की दाल अथवा कुछ धन सफाई कर्मी को देना चाहिए.

लाल किताब में ग्रहों के उपाय और टोटकों को विशेष रूप से बताया गया है.राहु केतु से पीड़ित होने पर स्वास्थ्य लाभ हेतु रात को साते समय सिरहाने में जौ रखकर सोना चाहिए और इसे सुबह पंक्षियों को देना चाहिए.सरकारी पक्ष से परेशानी होने पर एवं रोजी रोजगार और व्यापार में कठिनाई आने पर अपने वजन के बराबर लकड़ी का कोयला चलते पानी में प्रवाहित करना चाहिए.केतु के अशुभ स्थिति से बचाव हेतु दूध में अंगूठा डालकर उसे चूसना चाहिए.सूर्य और चन्द्र की वस्तु यथा स्वेत वस्त्र, चांदी और तांबा दान करना चाहिए.

कालसर्प योग शांति
कालसर्प योग के अनिष्टकारी प्रभाव से बचने के लिए शास्त्रो में जो उपाय बताए गये हैं उनके अनुसार प्रतिदिन पंचाक्षरी मंत्र "ऊँ नम शिवाय अथवा महामृत्युंजय मंत्र का 108 जप करना चाहिए. काले अकीक की माला से राहु ग्रह का बीज मंत्र 108 बार जप करना चाहिए. शनिवार के दिन पीपल की जड़ को जल से सिंचना चाहिए. नागपंचमी के दिन व्रत रखकर नाग देव की पूजा करनी चाहिए. मोरपंखधारी भगवान श्री कृष्ण की पूजा करनी चाहिए. शनिवार या पंचमी तिथि के दिन 11 नारियल बहते जल में प्रवाहित करने चाहिए. धातु से बने 108 नाग नागिन के जोड़े बहते जल में प्रवाहित करने चाहिए. सोमवार के दिन किसी विद्वान पंडित से रूद्राभिषेक कराना चाहिए. कालसर्प गायत्री मंत्र का जप करना चाहिए. इन उपायों से काल सर्प और सर्प योग के अनिष्टकारी प्रभाव में कमी आती है और जीवन में इनके कारण आने वाले अवरोधों का सामना नहीं करना होता है. 

जो व्यक्ति कालसर्प योग में होते हैं वे सांप से भयभीत रहते हैं. इन्हें सांप काटने का डर लगा रहता है. सपने में शरीर पर सांप लिपटा होना दिखाई देना या सांप का सपना आना यह भी इस योग के लक्षण हैं. ऊँचाई पर जाने पर अनजाना भय सताना, घबराहट और बेचैनी होना तथा सुनसान स्थानों पर जाने से मन में भय आना कालसर्प का लक्षण माना जाता है. 

लाल किताब से कालसर्प के उपाय
लाल किताब के अनुसार कालसर्प योग में राहु खाना नम्बर एक में हो और केतु खाना नम्बर सात में तब अपने पास चांदी की ठोस गोली रखनी चाहिए.राहु दो में और केतु आठ में तब दो रंगा का कम्बल दान करना चाहिए.तीन और नौ में क्रमश: राहु केतु हो तो चने की दाल नदी अथवा तलाब में प्रवाहित करना चाहिए.सोना धारण करने से भी लाभ मिलता है.चतुर्थ भाव में राहु हो और दशम भाव में केतु तब चांदी की डिब्बी में शहद भरकर घर के बाहर ज़मीन में दबाना लाभप्रद होता है.खाना नम्बर पांच में राहु हो और केतु खाना नम्बर ग्यारह में और सभी ग्रह इनके बीच में तब घर में चांदी का ठोस हाथी रखने से कालसर्प का विपरीत प्रभाव कम होता है.षष्टम में राहु और द्वादश में केतु होने पर कुत्ता पालने एवं बहन की सेवा करने से लाभ मिलता है. सप्तम में राहु हो और प्रथम में केतु तब लाल रंग की लोहे की गोली सदैव साथ रखना चाहिए एवं चांदी की डिब्बी में नदी का जल भरकर उसमें चांदी का एक टुकड़ा डालकर घर में रखना चाहिए.नवम में राहु हो और खाना नम्बर तीन में केतु हो तब चने की दाल बहते पानी में प्रवाहित करना चाहिए.

जिनकी कुण्डली में दसम खाने में राहु हो और केतु चौथे खाने में उन्हें पीतल के बर्तन में नदी या तालब का जल भरकर घर के अंधेरे कोने में रखना चाहिए.एकादश और पंचम में क्रमश: इस प्रकार की स्थिति हो तो 43 दिनों तक देव स्थान में मूली दान करना चाहिए.द्वादश खाने में राहु हो और षष्टम में केतु हो तो स्वर्ण धारण करने से लाभ होता है.







जानिए हिंदू नववर्ष को ...

जैसे ईसा (अंग्रेजी), चीन या अरब का कैलेंडर है उसी तरह राजा विक्रमादित्य के काल में भारतीय वैज्ञानिकों ने इन सबसे पहले ही भारतीय कैलेंडर विकसित किया था। इस कैलेंडर की शुरुआत हिंदू पंचांग के अनुसार चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से मानी जाती है

मार्च माह से ही दुनियाभर में पुराने कामकाज को समेटकर नए कामकाज की रूपरेखा तय की जाती है। इस धारणा का प्रचलन विश्व के प्रत्येक देश में आज भी जारी है। 21 मार्च को पृथ्वी सूर्य का एक चक्कर पूरा कर लेती है, ‍उस वक्त दिन और रात बराबर होते हैं।

12 माह का एक वर्ष और 7 दिन का एक सप्ताह रखने का प्रचलन विक्रम संवत से ही शुरू हुआ। महीने का हिसाब सूर्य व चंद्रमा की गति पर रखा जाता है। विक्रम कैलेंडर की इस धारणा को यूनानियों के माध्यम से अरब और अंग्रेजों ने अपनाया। बाद में भारत के अन्य प्रांतों ने अपने-अपने कैलेंडर इसी के आधार पर विकसित किए।

प्राचीन संवत :

विक्रम संवत से पूर्व 6676 ईसवी पूर्व से शुरू हुए प्राचीन सप्तर्षि संवत को हिंदुओं का सबसे प्राचीन संवत माना जाता है, जिसकी विधिवत शुरुआत 3076 ईसवी पूर्व हुई मानी जाती है।

सप्तर्षि के बाद नंबर आता है कृष्ण के जन्म की तिथि से कृष्ण कैलेंडर का फिर कलियुग संवत का। कलियुग के प्रारंभ के साथ कलियुग संवत की 3102 ईसवी पूर्व में शुरुआत हुई थी।

विक्रम संवत :

इसे नव संवत्सर भी कहते हैं। संवत्सर के पाँच प्रकार हैं सौर, चंद्र, नक्षत्र, सावन और अधिमास। विक्रम संवत में सभी का समावेश है। इस विक्रम संवत की शुरुआत 57 ईसवी पूर्व में हुई। इसको शुरू करने वाले सम्राट विक्रमादित्य थे इसीलिए उनके नाम पर ही इस संवत का नाम है। इसके बाद 78 ईसवी में शक संवत का आरम्भ हुआ।

नव संवत्सर :

जैसा ऊपर कहा गया कि वर्ष के पाँच प्रकार होते हैं। मेष, वृषभ, मिथुन, कर्क आदि सौरवर्ष के माह हैं। यह 365 दिनों का है। इसमें वर्ष का प्रारंभ सूर्य के मेष राशि में प्रवेश से माना जाता है। फिर जब मेष राशि का पृथ्वी के आकाश में भ्रमण चक्र चलता है तब चंद्रमास के चैत्र माह की शुरुआत भी हो जाती है। सूर्य का भ्रमण इस वक्त किसी अन्य राशि में हो सकता है।

चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ आदि चंद्रवर्ष के माह हैं। चंद्र वर्ष 354 दिनों का होता है, जो चैत्र माह से शुरू होता है। चंद्र वर्ष में चंद्र की कलाओं में वृद्धि हो तो यह 13 माह का होता है। जब चंद्रमा चित्रा नक्षत्र में होकर शुक्ल प्रतिपदा के दिन से बढ़ना शुरू करता है तभी से हिंदू नववर्ष की शुरुआत मानी गई है।

सौरमास 365 दिन का और चंद्रमास 355 दिन का होने से प्रतिवर्ष 10 दिन का अंतर आ जाता है। इन दस दिनों को चंद्रमास ही माना जाता है। फिर भी ऐसे बढ़े हुए दिनों को मलमास या अधिमास कहते हैं।

लगभग 27 दिनों का एक नक्षत्रमास होता है। इन्हें चित्रा, स्वाति, विशाखा, अनुराधा आदि कहा जाता है। सावन वर्ष 360 दिनों का होता है। इसमें एक माह की अवधि पूरे तीस दिन की होती है।

नववर्ष की शुरुआत का महत्व:

नववर्ष को भारत के प्रांतों में अलग-अलग तिथियों के अनुसार मनाया जाता है। ये सभी महत्वपूर्ण तिथियाँ मार्च और अप्रैल के महीने में आती हैं। इस नववर्ष को प्रत्येक प्रांत में अलग-अलग नामों से जाना जाता है। फिर भी पूरा देश चैत्र माह से ही नववर्ष की शुरुआत मानता है और इसे नव संवत्सर के रूप में जाना जाता है। गुड़ी पड़वा, होला मोहल्ला, युगादि, विशु, वैशाखी, कश्मीरी नवरेह, उगाडी, चेटीचंड, चित्रैय तिरुविजा आदि सभी की तिथि इस नव संवत्सर के आसपास ही आती है।

इस विक्रम संवत में नववर्ष की शुरुआत चंद्रमास के चैत्र माह के उस दिन से होती है जिस दिन ब्रह्म पुराण अनुसार ब्रह्मा ने सृष्टि रचना की शुरुआत की थी। इसी दिन से सतयुग की शुरुआत भी मानी जाती है। इसी दिन भगवान विष्णु ने मत्स्य अवतार लिया था। इसी दिन से नवरात्र की शुरुआत भी मानी जाती है। इसी दिन को भगवान राम का राज्याभिषेक हुआ था और पूरे अयोध्या नगर में विजय पताका फहराई गई थी। इसी दिन से रात्रि की अपेक्षा दिन बड़ा होने लगता है।

ज्योतिषियों के अनुसार इसी दिन से चैत्री पंचांग का आरम्भ माना जाता है, क्योंकि चैत्र मास की पूर्णिमा का अंत चित्रा नक्षत्र में होने से इस चैत्र मास को नववर्ष का प्रथम दिन माना जाता है।

नववर्ष मनाने की परंपरा :

रात्रि के अंधकार में नववर्ष का स्वागत नहीं होता। नया वर्ष सूरज की पहली किरण का स्वागत करके मनाया जाता है। नववर्ष के ब्रह्ममुहूर्त में उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदि से घर में सुगंधित वातावरण कर दिया जाता है। घर को ध्वज, पताका और तोरण से सजाया जाता है।

ब्राह्मण, कन्या, गाय, कौआ और कुत्ते को भोजन कराया जाता है। फिर सभी एक-दूसरे को नववर्ष की बधाई देते हैं। एक दूसरे को तिलक लगाते हैं। मिठाइयाँ बाँटते हैं। नए संकल्प लिए जाते हैं।

SRI DURGA KAVACH - श्री दुर्गा कवच


|| श्री दुर्गा कवच ||

ऋषि मार्कंड़य ने पूछा जभी !
दया करके ब्रह्माजी बोले तभी !!
के जो गुप्त मंत्र है संसार में !
हैं सब शक्तियां जिसके अधिकार में !!
हर इक का कर सकता जो उपकार है !
जिसे जपने से बेडा ही पार है !!
पवित्र कवच दुर्गा बलशाली का !
जो हर काम पूरे करे सवाल का !!
सुनो मार्कंड़य मैं समझाता हूँ !
मैं नवदुर्गा के नाम बतलाता हूँ !!
कवच की मैं सुन्दर चोपाई बना !
जो अत्यंत हैं गुप्त देयुं बता !!
नव दुर्गा का कवच यह, पढे जो मन चित लाये !
उस पे किसी प्रकार का, कभी कष्ट न आये !!
कहो जय जय जय महारानी की !
जय दुर्गा अष्ट भवानी की !!
पहली शैलपुत्री कहलावे !
दूसरी ब्रह्मचरिणी मन भावे !!
तीसरी चंद्रघंटा शुभ नाम !
चौथी कुश्मांड़ा सुखधाम !!
पांचवी देवी अस्कंद माता !
छटी कात्यायनी विख्याता !!
सातवी कालरात्रि महामाया !
आठवी महागौरी जग जाया !!
नौवी सिद्धिरात्रि जग जाने !
नव दुर्गा के नाम बखाने !!
महासंकट में बन में रण में !
रुप होई उपजे निज तन में !!
महाविपत्ति में व्योवहार में !
मान चाहे जो राज दरबार में !!
शक्ति कवच को सुने सुनाये !
मन कामना सिद्धी नर पाए !!
चामुंडा है प्रेत पर, वैष्णवी गरुड़ सवार !
बैल चढी महेश्वरी, हाथ लिए हथियार !!
कहो जय जय जय महारानी की !
जय दुर्गा अष्ट भवानी की !!
हंस सवारी वारही की !
मोर चढी दुर्गा कुमारी !!
लक्ष्मी देवी कमल असीना !
ब्रह्मी हंस चढी ले वीणा !!
ईश्वरी सदा बैल सवारी !
भक्तन की करती रखवारी !!
शंख चक्र शक्ति त्रिशुला !
हल मूसल कर कमल के फ़ूला !!
दैत्य नाश करने के कारन !
रुप अनेक किन्हें धारण !!
बार बार मैं सीस नवाऊं !
जगदम्बे के गुण को गाऊँ !!
कष्ट निवारण बलशाली माँ !
दुष्ट संहारण महाकाली माँ !!
कोटी कोटी माता प्रणाम !
पूरण की जो मेरे काम !!
दया करो बलशालिनी, दास के कष्ट मिटाओ !
चमन की रक्षा को सदा, सिंह चढी माँ आओ !!
कहो जय जय जय महारानी की !
जय दुर्गा अष्ट भवानी की !!
अग्नि से अग्नि देवता !
पूरब दिशा में येंदरी !!
दक्षिण में वाराही मेरी !
नैविधी में खडग धारिणी !!
वायु से माँ मृग वाहिनी !
पश्चिम में देवी वारुणी !!
उत्तर में माँ कौमारी जी!
ईशान में शूल धारिणी !!
ब्रहामानी माता अर्श पर !
माँ वैष्णवी इस फर्श पर !!
चामुंडा दसों दिशाओं में, हर कष्ट तुम मेरा हरो !
संसार में माता मेरी, रक्षा करो रक्षा करो !!
सन्मुख मेरे देवी जया !
पाछे हो माता विजैया !!
अजीता खड़ी बाएं मेरे !
अपराजिता दायें मेरे !!
नवज्योतिनी माँ शिवांगी !
माँ उमा देवी सिर की ही !!
मालाधारी ललाट की, और भ्रुकुटी कि यशर्वथिनी !
भ्रुकुटी के मध्य त्रेनेत्रायम् घंटा दोनो नासिका !!
काली कपोलों की कर्ण, मूलों की माता शंकरी !
नासिका में अंश अपना, माँ सुगंधा तुम धरो !!
संसार में माता मेरी, रक्षा करो रक्षा करो !!
ऊपर वाणी के होठों की !
माँ चन्द्रकी अमृत करी !!
जीभा की माता सरस्वती !
दांतों की कुमारी सती !!
इस कठ की माँ चंदिका !
और चित्रघंटा घंटी की !!
कामाक्षी माँ ढ़ोढ़ी की !
माँ मंगला इस बनी की !!
ग्रीवा की भद्रकाली माँ !
रक्षा करे बलशाली माँ !!
दोनो भुजाओं की मेरे, रक्षा करे धनु धारनी !
दो हाथों के सब अंगों की, रक्षा करे जग तारनी !!
शुलेश्वरी, कुलेश्वरी, महादेवी शोक विनाशानी !
जंघा स्तनों और कन्धों की, रक्षा करे जग वासिनी !!
हृदय उदार और नाभि की, कटी भाग के सब अंग की !
गुम्हेश्वरी माँ पूतना, जग जननी श्यामा रंग की !!
घुटनों जन्घाओं की करे, रक्षा वो विंध्यवासिनी !
टकखनों व पावों की करे, रक्षा वो शिव की दासनी !!
रक्त मांस और हड्डियों से, जो बना शरीर !
आतों और पित वात में, भरा अग्न और नीर !!
बल बुद्धि अंहकार और, प्राण ओ पाप समान !
सत रज तम के गुणों में, फँसी है यह जान !!
धार अनेकों रुप ही, रक्षा करियो आन !
तेरी कृपा से ही माँ, चमन का है कल्याण !!
आयु यश और कीर्ति धन, सम्पति परिवार !
ब्रह्मणी और लक्ष्मी, पार्वती जग तार !!
विद्या दे माँ सरस्वती, सब सुखों की मूल !
दुष्टों से रक्षा करो, हाथ लिए त्रिशूल !!
भैरवी मेरी भार्या की, रक्षा करो हमेश !
मान राज दरबार में, देवें सदा नरेश !!
यात्रा में दुःख कोई न, मेरे सिर पर आये !
कवच तुम्हारा हर जगह, मेरी करे सहाए !!
है जग जननी कर दया, इतना दो वरदान !
लिखा तुम्हारा कवच यह, पढे जो निश्चय मान !!
मन वांछित फल पाए वो, मंगल मोड़ बसाए !
कवच तुम्हारा पढ़ते ही, नवनिधि घर मे आये !!
ब्रह्माजी बोले सुनो मार्कंड़य !
यह दुर्गा कवच मैंने तुमको सुनाया !!
रहा आज तक था गुप्त भेद सारा !
जगत की भलाई को मैंने बताया !!
सभी शक्तियां जग की करके एकत्रित !
है मिट्टी की देह को इसे जो पहनाया !!
चमन जिसने श्रद्धा से इसको पढ़ा जो !
सुना तो भी मुह माँगा वरदान पाया !!
जो संसार में अपने मंगल को चाहे !
तो हरदम कवच यही गाता चला जा !!
बियाबान जंगल दिशाओं दशों में !
तू शक्ति की जय जय मनाता चला जा !!
तू जल में तू थल में तू अग्नि पवन में !
कवच पहन कर मुस्कुराता चला जा !!
निडर हो विचर मन जहाँ तेरा चाहे !
चमन पाव आगे बढ़ता चला जा !!
तेरा मान धन धान्य इससे बढेगा !
तू श्रद्धा से दुर्गा कवच को जो गाए !!
यही मंत्र यन्त्र यही तंत्र तेरा !
यही तेरे सिर से हर संकट हटायें !!
यही भूत और प्रेत के भय का नाशक !
यही कवच श्रद्धा व भक्ति बढ़ाये !!
इसे निसदिन श्रद्धा से पढ़ कर !
जो चाहे तो मुह माँगा वरदान पाए !!
इस स्तुति के पाठ से पहले कवच पढे !
कृपा से आधी भवानी की, बल और बुद्धि बढे !!
श्रद्धा से जपता रहे, जगदम्बे का नाम !
सुख भोगे संसार में, अंत मुक्ति सुखधाम !!
कृपा करो मातेश्वरी, बालक चमन नादाँ !
तेरे दर पर आ गिरा, करो मैया कल्याण !!
!! जय माता दी !!

क्यों है, एक ओंकार सतनाम ? - ओशो

नानक कहते हैं कि उस एक का जो नाम है, वही ओंकार है। और सब नाम तो आदमी के दिए हुए हैं- राम कहो, कृष्ण कहो, अल्लाह कहो। ये हमने बनाए हैं। लेकिन उसका एक नाम जो हमने नहीं दिया- वह ओंकार है।

क्यों ओंकार उसका नाम है? क्योंकि जब सब शब्द खो जाते हैं और चित्त शून्य हो जाता है, तब ओंकार की धुन सुनाई पड़ती है। वह हमारी बनाई हुई धुन नहीं है। वह अस्तित्व की धुन है। एक ध्वनि है। कोई उसका स्रोत नहीं है। कोई उसे पैदा नहीं करता।

जैसे कि जल प्रपात के पास बैठो तो उसकी एक ध्वनि है। लेकिन वह पानी और चट्टान की टक्कर से पैदा होती है। हवा का झोंका निकलता है, तो जो सरसराहट होती है, वह हवा और वृक्ष की टक्कर से पैदा होती है। संगीतज्ञ गीत गाता है, वीणा का कोई तार छेड़ता है- लेकिन ये सभी ध्वनियां संघर्ष से पैदा होती हैं। संघर्ष के लिए दो जरूरी हैं। तार चाहिए वीणा का और हाथ चाहिए उसे छेड़ने वाला। इस तरह जितनी ध्वनियां द्वैत से पैदा होती हैं, उनमें से कोई भी उसका सच्चा नाम नहीं हो सकता। उसका नाम तो वही है- जब सारा द्वैत खो जाता है, तब जो एक ध्वनि गूंजती रहती है।

नानक कहते हैं, वही एक उसका नाम है- ओंकार। नानक बहुत बार 'नाम' शब्द का प्रयोग करेंगे। कहते हैं, उसके नाम की रटन में जो डूब जाएगा, वह उसे पा लेगा। तो ध्यान रखना, नाम जब भी नानक कहते हैं, तब उनका इशारा ओंकार की तरफ है। क्योंकि वही एक उसका नाम है, जो हमने नहीं दिया।

यह 'सत' शब्द भी समझ लेने जैसा है। संस्कृत में दो शब्द हैं- एक सत और एक सत्य। सत का अर्थ होता है एक्जिस्टेंस, अस्तित्व। और सत्य का अर्थ होता है ट्रुथ। मूल धातु तो एक है, लेकिन कुछ फर्क हैं, जिन्हें समझ लेना जरूरी है। सत्य तो चिंतक की खोज है- वह खोजता है कि दो और दो मिल कर चार होते हैं, पांच नहीं होते, तीन भी नहीं होते। गणित का यह सूत्र सत्य है, लेकिन सत नहीं है। क्योंकि यह मनुष्य का ही हिसाब है।

तुम सपना देखते हो रात को। सपना सत तो है , लेकिन सत्य नहीं है। सपना है तो ! नहीं होता तो देखते कैसे ?लेकिन तुम यह नहीं कह सकते कि सत्य है। क्योंकि सुबह पाते हो कि वह न होने के बराबर है। लेकिन वह हुआजरूर था ! एक सपना घटा था। तो दुनिया में ऐसी घटनाएं हैं जो सत्य हैं और सत नहीं। और ऐसी भी घटनाएं हैं, जो सत हैं लेकिन सत्य नहीं। गणित सत्य है , सत नहीं। और सपना सत है , सत्य नहीं।

परमात्मा दोनों है - सत भी , सत्य भी। और इसलिए न तो उसे गणित से पाया जा सकता , न विज्ञान से। विज्ञानखोजता है सत्य को और कला खोजती है सत को। इसलिए न तो कला उसे पूरा खोज सकती है और न विज्ञान।दोनों अधूरे हैं। तो जब नानक कहते हैं , एक ओंकार सतिनाम - तो इस सत में दोनों हैं - सत्य और सत। उस परमअस्तित्व का नाम , जो गणित की तरह सच है और जो काव्य की तरह भी सत है। जो स्वप्न की तरह मधुर है औरगणित की तरह सही है। जो हृदय की भावना की तरह भी है और मस्तिष्क की प्रतीति की भांति भी है।

जहां मस्तिष्क और हृदय मिलते हैं , वहीं धर्म शुरू होता है। अगर मस्तिष्क अकेला रहे या हृदय को दबा दे , तोविज्ञान पैदा होता है। अगर हृदय अकेला रहे या मस्तिष्क को हटा दे , तो कल्पना और कला पैदा होती है। औरअगर मस्तिष्क और हृदय दोनों मिल जाएं , दोनों का संयोग हो जाए , तो हम ओंकार में प्रवेश करते हैं।

सिक्‍खों का इतिहास वास्‍तव में सिक्‍ख खत्री गुरूओं का ही इतिहास है

सिक्खों का इतिहास वास्तव में सिक् खत्री गुरूओं का ही इतिहास है , जो गुरू नानक से गुरू गोविन् सिंह तक बताया जाता है। सिख धर्म प्रचारक गुरू नानक लाहौर जिले के तलबंडी (ननकाहा साहिब) के वेदी खत्री थे। उनके उत्तराधिकारी गुरू अंगद टिहुन खत्री थे। उसका असली नाम लहना था। गुरू अमरदास ( 1552-1574) भल्ला खत्री थे। हरमंदिर या स्वर्णमंदिर के संस्थापक गुरू रामदास (1554-1581 ) खत्रियों की सोढी अल् के थे। गुरू गोविंद सिंह ने अपने ग्रंथ 'विचित्र नाटक के अध्याय दो से 4 में अपनी और गुरू नानक की उत्पत्ति भगवान रामचंद्र के पुत्र लव और कुश के वंश में बतायी है। गुरू गोविन् सिंह सिक्खों के अंतिम गुरू थे।

मुगल काल में सिक्‍ख खत्री गुरूओं के इतिहास की एक अलग ही कहानी है। 1901 की जनगणना के कुल 1030078 खत्रियों की जनसंख्‍या में 60685 सिख खत्री दर्ज किए गए थे। इस जनगणना में जैन धर्म को माननेवाले 704 और बौद्ध धर्म को माननेवाले 27 खत्री भी दर्ज किए गए थे। आज इन सिक्‍ख खत्रियों में कुछ अल्‍ले विशेष रूप से पायी जाती हैं , जैसे अगिया , अरिन , उहिल , एलवी , कालछर , खुमाड , गंगादिल , चारखंडे , चुनाई , छेमदा , जुडे , तिपुरा , तेहर , थागर , पखरा , फलदा , भगादि , भोगर , मालगुरू , बालगौर , वाहगुरू , शोडिल , हेगर , हूगर औ हांडी वगैरह ।

हिन्‍दू और सिक्‍ख खत्रियों का संबंध तो पूरी तरह रोटी बेटी का सा एक ही रहा है। दोनो का खान पान , विवाह संस्‍कार और अन्‍य प्रथाएं भी एक जैसी रही हैं। एक समय में खत्री परिवार में पैदा होनेवाला पहला बालक संस्‍कार करके सिख बनाया जाता था। अरदास और भोग हिन्‍दु खत्रियों में भी समान रूप से प्रचलित था। सिक्‍ख खत्रियों में गुरू नानक वेदी और अन्‍य सभी सोढी खत्री थे। सिक्‍ख खत्री आज भी अपने नाम के साथ खत्री ही लगाते हैं , ताकि उनमें और जाट सिक्‍खों में अंतर किया जा सके तथा अन्‍य सिखों में उन्‍हें आसानी से पहचाना जा सके।

इस तरह हिन्‍दू और सिख धर्म को जोडनेवाली कडी खत्री ही है। धर्म से उनके बीच कोई फर्क नहीं पडा है तथा दोनो ही धर्म मानने वाले खत्री साथ साथ भोजन तो करते ही हैं , विवाहादि संबंध भी वैसे ही करते हैं , जैसे वैश्‍य वर्ग के लोग जैनियों से करते हैं। बीच में आतंकवादी गतिविधियों के कारण इसमें कुछ व्‍यवधान अवश्‍य आया था , पर समय के साथ पुन: यह प्रभावहीन होता चला गया और पंजाब में हिन्‍दुओं और सिखों के मध्‍य विभाजन नहीं हो सका।इस राजनीतिक चाल का असफल हो जाना बहुत अच्‍छी बात रही। यह सिख हिन्‍दु मैरिज एक्‍ट और डाइवोर्स एक्‍ट के अधीन ही आते हैं। इस तरह शताब्दियों पुरानी खत्री जाति परंपराएं , रीति रिवाज और संबंधों की ही ऐसी कडी बनाता आया हैं , जिन्‍हें व्‍यक्तिगत स्‍वार्थवश नहीं तोडा जा सकता

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यह लेख पहले फेसबुक पर भी पोस्ट किया गया था, परन्तु कुछ सिख भाइयों ने इसे बिना पड़े ही विवाद खड़ा कर दिया, हमारा आग्रह है कि आप पहले इसे पड़ लें और उसके बाद ही कोई टिप्पणी दें .



Teej...


Just as in the case of several other Hindu festival, many traditions and rituals are associated with Teej celebrations। On Teej, women keep fast and perform other customs for long and healthy life of their husband. Every ritual has its own significance and so ladies perform all Teej customs with extreme devotion. Women start preparing for Teej well in advance and go out shopping to bring all the items used in performing Teej rituals.

Teej Customs and Rituals
Teej customs and rituals make the festival more interesting and full of colors। Women who observe fast for their husband take proper care that no carelessness is committed while carrying out the rituals. Teej festival calls for performance of all rituals seriously if one wants to be blessed with marital bliss.

Shrinjhara
To celebrate the auspicious occasion of Teej, women perform some serious rituals. It is customary for married women to return to their parents' home at the time of Teej. Married women and engaged girls get lot of presents from their father-in-law as per Teej customs. A traditional gift package called 'Shrinjhara' or 'Sindhare' is gifted to their daughter-in-law. This traditional name originated from the Hindi word shringaar meaning adornment. Shrinjhara package consists of Ghewar (sweet), traditional laheria dress (tie & dye), henna and lac bangles. All these items are used by the ladies to adorn herself.

Baya
Baya is another traditional package given to women observing fast on Teej. It includes dry fruits, mathris, new clothes, bangles and jewelry. It is given by mothers of the newly wed girls on the Teej Festival day.

Tradition to Adorn Oneself
On Teej, both married and unmarried girls dress up in traditional colored clothes. Women are usually seen in auspicious red, green and yellow colored lehangas, suits and sarees. Women start shopping for Teej well in advance. It gives them the opportunity to look beautiful of all.

Mehandi and Alta
The most important ritual is to beautify hands with special mehandi designs and alta. Girls and women apply intricate patterns of alta and mehandi to their hands and feet. This is also a part of Teej Shringar. Women usually hide name of their love in these mahendi designs and later ask them to find out their name. This tradition becomes a playful activity and adds vigor to the day's celebration.

Jewelry
Ladies also wear new gold and diamond jewelry. Some women wear very heavy jewelry while some wear light jewelry. Women have full liberty to ask for anything they wish. Even their husband do not stop them from doing anything and gift them whatever they desire as they starve themselves for well-being of their husband.

Teej Fast
The most important ritual of Teej Festival is Teej Fast. Women and unmarried girls keep fast for long and healthy life of their husband. Teej fast goes for 24 long hours. It is the most rigorous fast in which a woman neither drinks nor eat.

Tradition of Lighting a Lamp
As per the ritual of Teej fasting, a woman should keep an oil lamp lit all night। If the oil lamp dies away, it is considered a bad omen.

Goddess Parvati




The most important ritual of Teej is to bedeck Parvati Mata and carry out auspicious processions on the streets. Idol of Goddess Parvati is decorated with fine jewelry and new colorful clothes. The fasting day of Teej is very vital as women pray to Goddess for marital bliss and happy life.

Swings
Last but not the least, swings are the common sight when Teej is near. Beautifully decorated swings are hung from trees in the garden and gaily dressed up women swing and sing traditional Teej songs. Some women also dance while singing the holy songs.

Teej Celebrations


Teej celebrations takes place in various parts of Rajasthan, Punjab and Gujarat. Being an important women festival, Teej is celebrated with full verve and enthusiasm. It is held to mark the advent of monsoon season and also a very important festival for engaged and married women. On this day, women pray to Goddess Parvati for long and healthy life of their husband. There are many activities performed by women to celebrate the holy festival of Teej. Women feel immense pleasure in celebrating the festival and make various preparations before hand.

Why is Teej Celebrated?
Teej commemorates the reunion of Lord Shiva and Goddess Parvati. It is believed that Goddess Paravati took 108 births to have Lord Shiva as her husband. Since then it is proclaimed that who so ever worships Parvati Ma is blessed with happy married life. At the time of Teej, women observe Nirjara Vrat so that Goddess Parvati becomes happy and bless their husband with long and healthy life.

How is Teej Celebrated?

Teej is celebrated in a very colorful way. Women start preparing for Teej a week before the festival. For Teej celebration, women buy new clothes, jewelry and accessories to wear on the festival day. Markets are usually crowded with women shopping for various items to adorn oneself. On Teej, women try to look as beautiful as they can. Intricate mehndi designs are also applied to hands and feet. On the main Teej day, women even visit beauty parlors. Women spend a lot of money of Teej preparations. Even husbands do not say anything to their wife and help them in festival preparations.

Teej celebrations are not only confined to the women celebrating the festival. Teej celebrations take place round the city. A special Teej procession is organized in which the bedecked idol of Goddess Parvati is kept on a palanquin and carried out in the procession. Numerous artists, performers, band members and folk dancers follow the procession showing their magnificent skills. People dance down the streets along with other performers as they completely engross in Teej festivities.

Apart from this, women love to celebrate the festival by making their own special arrangements. Beautifully decorated swings are hung from trees and attractively dressed women dance and sing various Teej and Sawan songs. Fragrance of flowers on Teej swings pervade the atmosphere. After this, women offer prayers to Parvati Mata and the Teej Vrat successfully completes.

At the end of the day, husbands come to pick their wife and sometimes even bring presents for them. This way Teej Celebrations bring lot of happiness for both married and unmarried couples and create some everlasting memories.

Teej Mata – Goddess Parvati
Teej honors Goddess Parvati – symbol of utter devotion and love. Hence Teej is also called Teej Mata Festival. Both married and unmarried Hindu women observe the three-day-long festival seeking blissful married life and happiness for their husband. Teej festivities and its celebrations are dedicated to Goddess Parvati this is why it's purely a festival of womenfolk.

Goddess Parvati
The divine figure of Goddess Parvati is worshiped with earnest dedication at the time of Teej. The day's celebration has an ancient legend associated with it. It is said on this day Goddess Parvati reunited with her consort Lord Shiva. Mata Parvati went through rigorous fasting and a penance of 100 years. She took 108 births to be accepted by Lord Shiva in the form of his wife. Even today the auspicious day is celebrated to honor Goddess Parvati for her true love and positive spirit. And since the celebration of Teej totally relate to Goddess Parvati, so she is also called Teej Mata.
Procession of Teej Mata
On the last day, Teej idol is taken out from the pat (holy place where she is kept). The idol is freshly painted and bedecked with pure gold and other fine jewelry. Bright colors are used to decorate the Goddess. The idol is offered fruits, milk, chapati, nookti, ghewar and pure jal by saints performing prayers and chanting holy shlokas.

Teej idol covered with a canopy is taken out in the procession. Specially decorated 'band baaza' with a team of performers precede the procession. The 'Teej Mata Palki' or 'Takht-e-Rawan' is carried by 8 men dressed in red color. In the Pink City of Rajasthan, Jaipur where grand celebrations for Teej takes place carries out Teej Mata in a royal procession from the city palace so that the general public can pay homage to the festival Goddess and get their desires fulfilled.

In the Teej Mata procession there are around 10-12 elephants, 16 well-adorned horses and performers including dancers, singers and folk-artists. Beautifully decorated camels and bullock carts are an added attraction to the festival procession. Bhog is also given to the devotees who come closer to pay homage to the deity.

There is a huge rush to have a single glimpse of Teej Mata Palki. People in colorful traditional dresses even reach the top of houses and tree tops to have a splendid view of the holy procession. As the procession moves forward people keep offering precious ornaments to the idol. The time when “Mata” is about to reach back its place, the idol gets almost covered with gold and silver jewelry.
Teej Puja Process





Teej Puja is a vital part of Teej celebration. Women, both married and unmarried, start preparing for the final puja well in advance. The verve, enthusiasm and devotion is apparent on their face. On the puja day, women wear new and beautiful clothes. This is the day to look best of all. Teej Puja is not a very long affair. Women read aloud the Teej Katha and offer their worship to Goddess Parvati.
Teej Puja Rituals
Lot of activities and rituals are performed at the time of Teej Puja. Attired in traditional sarees and lehangas, women congregate in a temple to worship Parvati Ma, who took 108 births to reunite with Lord Shiva. On this day, idol of Goddess Parvati is bedecked with rich silk cloth and heavy jewelry. This day is considered very important as married women and engaged girls observe fast for long and healthy life of their husband and to-be-husband.
Teej Puja Process
Women either gather at a nearby temple or a garden where the puja is arranged. The main puja takes place with holy offerings of flowers, sweets and coins. A semi-circle is created and an idol of Goddess Parvati is kept in the middle. A pujarin or all the ladies together narrate the holy Teej Katha. Young girls also sit to listen the auspicious katha. While listening to the katha, women are expected to put their mind and thoughts towards their soul mate.

When the puja gets over women offer fruits, flowers and other holy items and seek blessings of Goddess Parvati for marital bliss. Another very important part of Teej Puja is the oil lamp which should be kept alight throughout the night as it is bad omen if it dies away.

At some places, after paying homage to Goddess Parvati, women bath with red mud found on the roots of the sacred Datiwan bush. This is an act of purification. It is believed that a woman is absolved from all sins after taking this holy bath.

At the end of the day, women share their happiness and joy by dancing and singing traditional songs in praise of Lord Shiva and her consort Parvati.

Teej in Punjab


Teej is an important festival for the women of Punjab. The sawan month is eagerly waited by the people of Punjab as different festivals fall at this time period. The festival of Teej brings exuberance and chance to get along each other. Young girls and boys actively participate in events taking place in various towns and districts in Punjab. Celebration of Teej begins from the third day of sawan - the fifth Hindu month beginning from Chaitra.

Teej Celebrations in Punjab
Young women and men enthusiastically celebrate the occasion of Teej. At the time of Teej, many schools and colleges in Punjab organize competitions and cultural programs. Some competitions are organized on higher scale and are attended by senior government officials. The theme of the competitions is totally traditional and cultural. Competitive categories include rangoli, mehndi, dance, singing, painting etc. In colleges, Teej beauty contests take place where young girls passionately participate and win various titles like “Miss Teej”, “Teej Queen” and “Baby Teej”.

Teej celebrations in villages too, are full of joy and verve. Young girls and women get along to perform Teej rituals. Girls swing on decorated swings called peeng and adorn their hands and feet with intricate mehndi designs.

Girls who perform gidda on Teej dedicate it to their husband or to-be-husband. Some of these special Teej dance and songs symbolize that women are always ready to sacrifice their life for their lover. After the dance performance young ladies offer prayers and sing songs for good health of their love. Teej fairs called Teelan are organized which has stalls with collection of traditional items like colorful bangles, juttis, dresses and earrings. Main attraction of Teej fair are the mehndi stalls.

At homes, people prepare special Punjabi Teej dishes like Kheer Puri, Gulgale, Karah and Pakoras. Family members sit together and enjoy the lavish feast. Men give blessings to their wife and both pray for each others' long and cheerful life.

Special Teej Punjabi Songs
Dance and songs are an integral part of Teej celebrations in Punjab. It is also considered a very important medium to convey their heartiest thoughts and messages . Women freely express their feelings for their love or husband by singing and dancing on traditional Teej songs. Some the most popular Punjabi Teej songs are:
"Sawan Da Mahina Din Giddha De Sabhe Sahalyan
Aiyan Nachan Kundan, Jhutan Pingan Piyan Vadiyan
Gharan Diya Jaiyan Bhij Gai Rooh Mitra Sham Ghatan Chad Aiyan".

A very common song sung to welcome the sawan festival of Teej after a long year is given below:
"Teeyan Teej Diyan Bhadon De Muklave Teeyan Teej Diyan”.

In the sawan month, young girls gather and celebrate the auspicious occasion of Teej. They dance on cultural songs with a perfect mood to welcome the sawan. One of the famous songs sung is:
"Sase Teri Mahen Marh Jaye,
Mere Veer Nu Sukhi Khand Payee."

In various households, a very beautiful song is sung on Teej which describes a woman's extreme love for her soul mate. She thinks that her lover's pain and sorrows are her own.
"Akh Mere Yaar Di Dukhe,
Lali Merian Akhan De Wich Aiyee".

The song given below depicts a love scene in which women consider her man to be a face of God.
"Aya Sawan Da Maheena Aa,
Tun menu Rab Lagdha Naleh Naleh Makka Te Madina Aa".

This song depicts a girl's desperation to meet her lover who is away for work.
"Teri Do Takyan Di Nokri
Mera Lakhan Da Sawan Jaye.
Chhuti Lai Ke Aja chann Ve"।


Punjabi Teej Songs

Sawan Aya Ni
Ral auo sahio ni,
Sabh tian khedan jaiye
Hun aya sawan ni
Pinghan piplin ja ke paiye
Pai ku ku kardi ni,
Sahio koel Hanju dolhe
Papiha wekho ni,
Bherha pee-pee kar ke bole.
Paye pailan pande ni,
Bagi moran shor machaya.
Arhio khil khil phaulan ne,
Sanu mahia yad kariya.

Sawan da Mahina
"Sawan Da Mahina Din Giddha De Sabhe Sahalyan
Aiyan Nachan Kundan, Jhutan Pingan Piyan Vadiyan
Gharan Diya Jaiyan Bhij Gai Rooh Mitra Sham Ghatan Chad Aiyan".



When is Teej?

There are three different variations of Teej, namely – Hariyali, Kajari and Hartalika Teej. All the three Teej falls in different times and are celebrated with fervor and enthusiasm by womenfolk in India. Date of Teej Festival is decided according to the arrival of monsoon and hence it changes every year. There are special rituals and customs associated with every Teej. These traditions hold great importance for women celebrating the festival of Teej. Read on to learn about different dates of all the three Teej celebrations.

When is Haryali Teej?
Celebrate Haryali Teej on August 2, 2011, Tuesday
Haryali Teej falls on Shukla Tritiya in the Hindu month of Sawan। The day heralds the onset of monsoon as a symbol of happiness, prosperity and love. As the name suggests, Haryali Teej is mainly related with greenery. It is commemorated for abundance of greenery and also a good harvest. Haryali Teej is celebrated in a grand way in the ancient 'Banke Bihari' temple of Vrindavan. Thousands of devotees congregate to worship Lord Krishna and Radha. Holy water is sprinkled over the devotees to welcome the monsoon season. At some places, womenfolk offer prayer to moon on the first day of Teej i.e. Haryali Teej.

Hariyali Teej


Hariyali Teej also called Teejen is celebrated with extreme mirth and devotion by womenfolk. It falls in the Shukla Paksha of Shravana, corresponding to the month of August. As the name says, Hariyali Teej relates to greenery. On this day, many women clad themselves in green colored clothes and wear green bangles. A special puja is performed to worship moon. Traditional singing of songs and dance escalates the verve of Haryali Teej celebrations.

Hariyali Teej Celebrations
A day before Hariyali Teej, women celebrate 'Sindhare'. It is a significant day for newly wed brides. On her first "Sindhara" after marriage, it is customary to receive clothes and ornaments from her Mother-in-law. On Hariyali Teej, women gather to worship moon. The puja performed on this occasion is done with milk, curd and flowers.

Hariyali Teej is mainly related with greenery and commemorates for abundance of greenery and good harvest. Women wear green colored clothes like lehanga, suits and sarees. They wear green bangles and adorn their hands with beautiful mehandi patterns. Women both married and unmarried enjoy the festive spirit by swinging on adorned swings singing songs relating to the month of Sawan. Various delicious food items are cooked which is relished by all in the family.

The day is enjoyed with full craze that even the Gujarati women adopt the Rajasthani traditions. In Gujarat, special Garba dance is arranged. Women in their traditional clothes, carry pots on their heads and dance singing songs in praise of Goddess Parvati.

In Maharashtra, women wear green bangles, green clothes, golden bindis and kajal for luck. They distribute beautifully painted coconuts to their female relatives and friends and offer fresh fruit and green vegetables to the goddess as thanks giving.

Hariyali Teej Celebrations in Vrindavan
There are great festivities in Vrindavan which goes on up to Janmashtmi. Lord Krishna devotees celebrate Hariyali Teej with great enthusiasm and excitement in the holy place of Vrindavan. At the time of Hariyali Teej, swings are laid down in the shrines of Vrindavan for the deities to swing upon. This religious ceremony is called 'Jhullan Leela'. Religious songs and hymns are chanted in the famous 'Banke Bihari' temple. Even leelas of Radha and Lord Krishna are narrated. Hariyali Teej is the most auspicious occasion as on this day idols Lord Krishna and Radha comes out of their 'pat' (place where idols are kept in the temple) to give their devotees a single vision. Idols of Lord krishna and Radha are adorned with fine clothes and jewelry.

The main attraction of Hariyali Teej in Vrindavan is the gold-ornamented swing of Lord Krishna which comes only once a year. After offering prayers in the temple, holy water is sprinkled over the devotees to give a feeling of the advent of the monsoon. Various devotees from India and abroad come to Vrindavan to attend special Hariyali Teej celebrations.


When is Kajari Teej?
Celebrate Kajari Teej on August 16, 2011, Tuesday
Kajli Teej is celebrated on Krishna Paksh Tritiya, the third day of the month of shravan. Kajli Teej is most popularly celebrated in a small district of Rajasthan called Bundi. In Bundi, Kajari Teej is celebrated on the third day of the month of 'Bhadra'.

On this day, there is a community pooja of neem and a procession is carried on which has beautifully decorated idol of Goddess Parvati.
Kajari Teej is celebrated with immense devotion and love. It falls on the Krishna Paksh Tritiiya, the third day of sawan or shravan - the fifth month in Hindu calendar. On the auspicious occasion of Kajli Teej, women gather to sing songs in honor ofLord Krishna and perform sacred pooja of neem.

Kajli Teej Celebrations
Kajli Teej is celebrated with extreme gaiety and enthusiasm by womenfolk. Women and young girls wear new clothes on Kajli Teej. On this day, swings are laid down in the garden and ladies sing auspicious songs and dance with full enthusiasm. Some Kajari songs are sung to welcome monsoon season while others depict happiness and union of lovers. There are some other songs which portray the pain of separation. Festival of Kajri Teej is also identified with blackish shades of clouds which cover the sky during the monsoon before raining down. On this day, there is a community pooja of neem. Women gather around the holy neem tree and perform specific rituals.

Kajari Teej in Bundi, Rajasthan
Celebrations of Kajari Teej in Bundi, Rajasthan are the most famous one. In Bundi, Kajari Teej is celebrated enthusiastically and joyfully. Here it is celebrated on the third day of the month of 'Bhadra'. The festival of Kajli Teej starts with a procession of Teej Goddess in a decorated palanquin. The procession moves from the picturesque Naval Sagar. It heads with bedecked elephants, camels, performers, musicians, folk dancers and artists. There are stunning performances by artists and cultural performers specially organized for the tourists who have come to see Kajari Teej celebrations in Bundi.

Kajari Teej in UP and Madhya Pradesh
Kajari Teej is also celebrated with extreme verve in parts of North and Central India also। Women in Madhya Pradesh and Uttar Pradesh, especially in Varanasi and Mirzapur celebrate Teej with enthusiasm। Rich folk heritage of these states are brought to light with Kajari Teej celebrations.

When is Hartalika Teej?
Celebrate Hartalika Teej on August 31, 2011, Wednesday
Hartalika Teej falls on the third day of the first fortnight of the month of 'Bhadra'. It is the most important Teej of all and lasts for three days. On the second day, women keep Nirjara Vrat for the welfare and longevity of their husband. Evening prayers along with traditional singing and dancing are important part of Hartalika Teej celebration.

Hartalika Teej


Hartalika Teej is the biggest of the various variation of Teej. Hartalika Teej falls on the third day of the first fortnight of the month of 'Bhadra'. It is a three-day festival which is celebrated by women in honor of Parvati Ma. On this day, womenfolk keep fast for long and conjugal life of their husband. Hartalika Teej fast proceeds without even drinking a drop of water. By rigorous fasting and praying to Goddess Parvati on Hartalika Teej, married women are blessed with healthy life of their husband while the unmarried girls are said to be blessed by a husband like Lord Shiva.

Hartalika Teej Celebrations
Hartalika Teej commemorates the reunion of Lord Shiva and Goddess Parvati. On this day, idol of Parvati Mata clad in bright colorful clothes is taken out in a palanquin in a procession. The procession of Hartalika Teej is represented by various artists and performers. Parvati idol is also accompanied by several elephants and camels which is the most attractive part of the Teej procession. A fair is also organized on Hartalika Teej.

Women celebrate the festival of Hartalika Teej with immense fervor and enthusiasm. Married ladies come back to their parents home to celebrate the festival. Hartalika Teej is the time to adorn oneself with new clothes and jewelry. Applying mehndi on hands and feet is a unique feature of Hartalika Teej celebrations. Women usually dress up in green colored clothes, wear golden bindi and apply a thick layer of kajal. They do their best to look beautiful at the time of Hartalika Teej.

Women also distribute beautifully painted coconuts to their female relatives and friends. Fresh fruits, sweets and green vegetables are offered to Goddess Parvati as thanks giving. The fasting day proceeds with evening prayers and traditional dancing and singing activities.


Prema Sai Baba: The next Avatar of Sai Baba


Sathya Sai Baba says that He is the second of a triple incarnation. The first was Shirdi Sai Baba and the third will be Prema Sai Baba. Below, we give the information that is known about Prema Sai Baba, with references to the sources.

The first mention of Prema Sai by Sathya Sai Baba appears to be in the discourse Shiva Shakthi, 6 July 1963, In a conversation between Shiva, Shakthi, and Bharadwaja after Bharadwaja performed a ritual, Shiva said that they would take human form and be born in the Bharadwaja lineage, thrice: Shiva alone as Shirdi Sai Baba, Shiva and Shakthi together at Puttaparthy as Sathya Sai Baba, and Shakthi alone as Prema Sai, later.

More information about Prema Sai :

We have heard often that Prema Sai will be born eight years after the passing of Sathya Sai Baba, which will take place when Sathya Sai Baba is 96. We do not have a reference for this information. In "The Sai Trinity", by Dr. S.P. Ruhela (Taring paperbacks, Vikas Pubishing House Pvt Ltd, New Delhi, 1997), the author states that Sathya Sai Baba has been disclosing small amounts of information to close devotees from time to time and states that Sai Baba has predicted that Prema Sai will be born in Karnataka about 8 years after He leaves this body.

Howard Murphet, in his book Sai Baba: Invitation to Glory (Chapter 4), says that Finally, Sathya Sai states, there will be Prema Sai who, one year after the passing of the Sathya Sai form, will be born in Karnataka (the old Mysore State), at a place between Bangalore and the city of Mysore. On page 16 of the book Living Divinity author Shakuntala Balu writes, Sri Sathya Sai Baba has said that there will be one more Sai Avatara called Prema Sai.

The third Sai will be born in Gunaparthi, a village in the Mandya district of Karnataka. Thus, Sri Sathya Sai Baba refers not only to his past, but also to the future form he will assume as Prema Sai. In Sathya Sai Baba, The Embodiment of Love, by Peggy Mason and Ron Laing, the authors write about a discussion they had about Prema Sai. We wondered if the next descent as Prema Sai, to come very quickly after the present form is vacated at the age of ninety six, would be female. Baba replied, "No, male, in Mysore -- Karnataka." (Since 1972, the state of Mysore is called Karnataka.) In Glimpses of the Divine: Working with the Teachings of Sai Baba" (1993), author Birgitte Rodriguez writes In a more private talk to students in recent years, Baba told them that the father of His next incarnation, as Prema Sai, had been born in the southern Indian state of Karnataka.

He also said that the body of Prema Sai was in the process of being formed. The missions of the triple incarnations In Spirit and the Mind, by Sam Sandweiss, the author recounts an extended interview given by Sathya Sai Baba to the Senior Editor, Mr. R.K. Karanjia, of Blitz new magazine in September 1976. Question: Why had this task to be divided into three separate incarnations of the Shirdi, Sathya, and Prema Baba? Baba: They are not separate.

I have already mentioned the complete oneness of the three in the final objective of the mission. ... Their tasks and powers requisite to them differ according to the time, the situation, and the environment. But they belong to, and derive from, the same divine body (dharma swarup). ... The previous Avatar, Shirdi Baba, laid the base for secular integration and gave mankind the message of duty as work.

The mission of the present Avatar is to make everybody realize that the same God or divinity resides in everyone. People should respect, love, and help each other irrespective of color or creed. Thus, all work can become a way of worship. Finally, Prema Sai, the third Avathar, will promote the evnagel news that not only does God reside in everybody, but everybody is God. That will be the final wisdom that will enable every man and woman to go to God.

The three Avathars carry the triple message of work, worship, and wisdom. Hislop's changing ring In John Hislop's My Baba and I, page 55-56, Hislop writes about Swami materializing a ring for Hislop with Prema Sai on it. The image of Prema Sai on the ring actually changed its position over the years. Hislop writes, The stone was a cameo of Prema Sai, the loving Lord of Creation, destined to appear on Earth a few years after the death of the Sathya Sai Body. It was a brownish stone, highly glazed, sculptured in profile, the bridge and length of the nose visible with a suggestion of the arch of the left eye. It was a noble head with shoulder-length hair, moustache, and beard; the head resting on, or emerging from, a lotus flower.

His countenance was tranquil, peaceful, majestic. Baba said, "He is only now in the process of birth, so I cannot show more of him. This is the first time he is shown to the world." ... Wherever I go, devotees ask to see the ring. ... In a year or so, those devotees who had seen the ring sometime earlier said something surprising on seeing it again. They said, "It is turning. The whole nose can be seen now.

" My reply was always, in truth, that I could see no change. But they said, "You see it every day and do not notice." ... One day, [in 1980], at a devotee meeting, I was showing the ring, and I looked at it carefully. It struck me, "It is different! It is changing!. Now the entire nose is there and visible, whereas at first the entire nose was not visible -- or better to say the nose merged into the edge of the stone and did not appear to be fully visible. But now there is a space between the nose and the edge of the stone. Moreover, a portion of the left eye can be seen and also a portion of the left cheek.

आइये जाने हिन्दू नववर्ष का महत्व


दो हजार वर्ष पहले शकों ने सौराष्ट्र और पंजाब को रौंदते हुए अवंती पर आक्रमण किया तथा विजय प्राप्त की। विक्रमादित्य ने राष्ट्रीय शक्तियों को एक सूत्र में पिरोया और शक्तिशाली मोर्चा खड़ा करके ईसा पूर्व 57 में शकों पर भीषण आक्रमण कर विजय प्राप्त की। थोड़े समय में ही इन्होंने कोंकण, सौराष्ट्र, गुजरात और सिंध भाग के प्रदेशों को भी शकों से मुक्त करवा लिया।

वीर विक्रमादित्य ने शकों को उनके गढ़ अरब में भी करारी मात दी। इसी सम्राट विक्रमादित्य के नाम पर भारत में विक्रमी संवत प्रचलित हुआ। सम्राट पृथ्वीराज के शासनकाल तक इसी संवत के अनुसार कार्य चला। इसके बाद भारत में मुगलों के शासनकाल के दौरान सरकारी क्षेत्र में हिजरी सन चलता रहा। इसे भाग्य की विडंबना कहें अथवा स्वतंत्र भारत के कुछ नेताओं की अकृतज्ञता कि सरकार ने शक संवत को स्वीकार कर लिया, लेकिन सम्राट विक्रमादित्य के नाम से प्रचलित संवत को कहीं स्थान न दिया।

31 दिसंबर की आधी रात को नव वर्ष के नाम पर नाचने वाले आम जन को देखकर तो कुछ तर्क किया जा सकता है, पर भारत सरकार को क्या कहा जाए जिसका दूरदर्शन भी उसी रंग में रंगा श्लील-अश्लील कार्यक्रम प्रस्तुत करने की होड़ में लगा रहता है और स्वयं राष्ट्रपति एवं प्रधानमंत्री पूरे राष्ट्र को नव वर्ष की बधाई देते हैं। भारतीय सांस्कृतिक जीवन का विक्रमी संवत से गहरा नाता है। इस दिन लोग पूजापाठ करते हैं और तीर्थ स्थानों पर जाते हैं। लोग पवित्र नदियों में स्नान करते हैं।

मांस-मदिरा का सेवन करने वाले लोग इस दिन इन तामसी पदार्था से दूर रहते हैं, पर विदेशी संस्कृति के प्रतीक और गुलामी की देन विदेशी नव वर्ष के आगमन से घंटों पूर्व ही मांस मदिरा का प्रयोग, श्लील-अश्लील कार्यक्रमों का रसपान तथा अन्य बहुत कुछ ऐसा प्रारंभ हो जाता है जिससे अपने देश की संस्कृति का रिश्ता नहीं है। विक्रमी संवत के स्मरण मात्र से ही विक्रमादित्य और उनके विजय अभियान की याद ताजा होती है, भारतीयों का मस्तक गर्व से ऊंचा होता है जबकि ईसवी सन के साथ ही गुलामी द्वारा दिए गए अनेक जख्म हरे होने लगते हैं। पूर्व प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई को जब किसी ने पहली जनवरी को नव वर्ष की बधाई दी तो उन्होंने उत्तर दिया था- किस बात की बधाई? मेरे देश और देश के सम्मान का तो इस नव वर्ष से कोई संबंध नहीं। यही हम लोगों को भी समझना होगा।

हमारे देश से गोरे अंग्रेज तो चले गए मगर काले अंग्रेजों को छोड़ गए। ये काले अंग्रेज विदेशी परंपराओं और फूहड़ नाच गानों के ऐसे दीवाने हैं कि अपने देश की गरिमामयी सांस्कृतिक परंपराओं, मूल्यों और आचरण का इनके लिए कोई मूल्य नहीं है। संस्कृति के इस प्रदूषण के करेले में नीम का काम किया है सैटेलाईट चैनलों ने। बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा प्रायोजित विदेशी उत्सवों को इन खबरिया चैनलों पर खूब प्रचार मिलता हैं मगर हमारे अपने ही देश की परंपराओं और संस्कृति से जुड़े कार्यक्रमों को लेकर इऩ चैनलों द्वारा हमेशा उदासीनता बरती जाती है। इसके बावजूद देश भर के और देश के बाहर बसे हमारे हजारों पाठकों ने हमसे आग्रह किया कि हम भारतीय नवसंवत्सर के महत्व, इसको मनाए जाने के तौर तरीके आदि के बारे में विस्तार से जानकारी दें।

गुड़ी पड़वा और इसका महत्व:

हमें गर्व है कि हम इसाई कैलेंडर से 57 साल आगे हैं। इसाई कैलेंडर जहाँ अभी वर्ष 2011 तक ही पहुँचा है, वहीं हमारा भारतीय कैलेंडर 4 अप्रैल 2011को गुड़ी पढ़वा के दिन 2068 वे वर्ष में प्रवेश कर जाएगा। इसी दिन से चैत्र नवरात्र प्रारंभ होंगे जिसका समापन रामनवमी पर होगा। 04 अप्रैल 2011 से शुरू हो रहे नव संवत्सर 2068 पर कई संगठनों द्वारा हिन्दू नव वर्ष का स्वागत किया जाएगा।

ऐसे तो विश्व के विशाल धरातल पर अनेक प्रकार वर्षों (कैलेंडरों) का प्रचलन है। उनके आरम्भ के अनुसार भिन्न-भिन्न कारणों के साथ भिन्न-भिन्न समय में मनाये जाने की परंपरा है। अपनी-अपनी आस्था-श्रद्धा, परंपरा, विभिन्न देश-राष्ट्र, धर्म-जाति, समाज और सांस्कृतिक मान्यताओं के अनुसार अपने-अपने तौर-तरीकों से नववर्ष बड़े धूमधाम से उत्साहपूर्वक मानते हैं। विशेष रूप से सम्पूर्ण विश्व में इसाई नववर्ष (३१ दिसम्बर की रात्रि और १ जनवरी के आरम्भ को लेकर) बड़े धूमधाम से मनाते हैं, किन्तु हमारा अपना भारतीय नववर्ष अति प्राचीन और वैज्ञानिक आधार लिये हुए है। हमारे धार्मिक एवं सांस्कृतिक संस्कारों के साथ भी जुड़ा हुआ है, अत: घर-घर में कुल धर्म के रूप में स्थापित भी हैं, इसे भव्यरूप में संगठित होकर मनाया जाना चाहिये।

चैत्र शुक्ल प्रतिपदा कल्पादि, सृष्टि्यादि, युगादि के आरंभ के साथ-साथ प्रथम सतयुग का आरंभ भी इसी दिवस से होने से यह भारतीय नववर्ष अति प्राचीन है। अरबों वर्षों की प्राचीनता इसके साथ जुड़ी हुई है। फिर उज्जैन कालगणना की सर्वसम्मत नगरी है, यही कालगणना के प्रतीक ज्योतिर्लिंग महाकालेश्वर भी स्थित है, इसी विशिष्टता के कारण सम्राट विक्रम ने विक्रम संवत् प्रदान किया था तथा जयपुर के महाराजा सवाई मानसिंह ने उज्जैन में वेधशाला की स्थापना की थी। अत: उज्जयिनी की महत्ता और भारतीय नववर्ष की प्राचीनता को जन-जन तक पहुँचाने की दृष्टि से संवत् २०३५ (सन् १९७८ ई.) से नववर्ष की शुभकामना संदेश और नववर्ष को उत्सव का स्वरूप देते हुए भिन्न-भिन्न नगरों में भी इस उत्सव को स्थापित करने की दिशा में सतत प्रयास कर रहे हैं। संवत् २०५७ (सन् २००० ई.) से इस उत्सव को भव्य रूप में शास्त्रीय मर्यादाओं के साथ आयोजित किए जा रहे हैं।

क्या विशेषता है हमारे नववर्ष की?

भारतीय नववर्ष की विशेषता, कैसे मनाये नववर्ष?

वेद-पुराण, इतिहास और शास्त्रीय परंपराओं को जोड़कर नववर्ष मनाये जाने की रूपरेखा तैयार की गई है। उज्जैन में संवत्सर मनाने की प्राचीन परंपरा क्यों चलती आ रही है? उस पर भी विचार किया गया है। आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा को सान्दीपनि स्मृति महोत्सव आदर्श गुरु शिष्य परंपरा को लेकर संवत् २०३५ से ही मनाया जा रहा है। श्रीकृष्ण जन्म को ५ हजार वर्ष से अधिक हो जाने के कारण ``व्यास-सान्दीपनि-श्रीकृष्ण पंचसहस्राब्दी पंच वर्षीय महोत्सव'' नाम देकर मना रहे हैं। हमारे प्रयास से नेपाल सहित देश के अन्य नगरों में भी यह उत्सव मनाया जा रहा है।

आओ हम सब मिलकर चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के प्रात: सूर्योदय पर नववर्ष का महोत्सव मनावें और इसके लिये अन्य लोगों को भी प्रेरित करें।

यातो धर्मस्ततो जय:।

श्री नववर्ष मङ्गलम

(कल्पादी-सृष्ट्यादि-युगादि महोत्सव)

चैत्र शुक्ल प्रतिपदा नववर्ष आरम्भ

चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के प्रात: सूर्योदय की प्रथम रश्मि के दर्शन के साथ नववर्ष का आरंभ होता है।

``मधौ सितादेर्दिनमासवर्षयुगादिकानां युगपत्प्रवृत्ति:''

महान गणितज्ञ भास्कराचार्य ने प्रतिबादित किया है कि चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से दिन-मास-वर्ष और युगादि का आरंभ हुआ है। युगों में प्रथम सतयुग का आरंभ भी इसी दिन से हुआ है। कल्पादि-सृष्ट्यादि-युगादि आरंभ को लेकर इस दिवस के साथ अति प्राचीनता जुड़ी हुई है। सृष्टि की रचना को लेकर इसी दिवस से गणना की गई है, लिखा है-

चैत्र-मासि जगद् ब्रह्मा ससर्ज प्रथमे%हनि ।

शुक्लपक्षे समग्रे तु तदा सूर्योदये सति ।।

चैत्र शुक्ल प्रतिपदा तिथि के सूर्योदय के समय से नवसंवत्सर का आरंभ होता है, यह अत्यंत पवित्र तिथि है। इसी दिवस से पितामह ब्रह्मा ने सृष्टि का सृजन किया था।

इस तिथि को रेवती नक्षत्र में, विष्कुंभ योग में दिन के समय भगवान का प्रथम अवतार मत्स्यरूप का प्रादुर्भाव भी माना जाता है-

कृते च प्रभवे चैत्रे प्रतिपच्छुक्लपक्षगा ।

रेवत्यां योग-विष्कुम्भे दिवा द्वादश-नाड़िका: ।।

मत्स्यरूपकुमार्यांच अवतीर्णो हरि: स्वयम् ।।


प्रकृति खुद स्वागत करती है इस दिन का

चैत्र शुक्ल पक्ष आरंभ होने के पूर्व ही प्रकृति नववर्ष आगमन का संदेश देने लगती है। प्रकृति की पुकार, दस्तक, गंध, दर्शन आदि को देखने, सुनने, समझने का प्रयास करें तो हमें लगेगा कि प्रकृति पुकार-पुकार कर कह रही है कि पुरातन का समापन हो रहा है और नवीन बदलाव आ रहा है, नववर्ष दस्तक दे रहा है। वृक्ष-पौधे अपने जीर्ण वस्त्रों को त्याग रहे हैं, जीर्ण-शीर्ण पत्ते पतझड़ के साथ वृक्ष शाखाओं से पृथक हो रहे हैं, वायु के द्वारा सफाई अभियान चल रहा है, प्रकृति के रचयिता अंकुरित-पल्लवित-पुष्पित कर बोराने की ओर ले जा रहे हैं, मानो पुरातन वस्त्रों का त्याग कर नूतन वस्त्र धारण कर रहे हैं। पलाश खिल रहे हैं, वृक्ष पुष्पित हो रहे हैं, आम बौरा रहे हैं, सरसों नृत्य कर रही है, वायु में सुगंध और मादकता की मस्ती अनुभव हो रही है।

shiit -व्यतीत होकर ग्रीष्म के आगमन के साथ मिला-जुला सुहाना मौसम अनुभव हो रहा है, यह सुहानी-सुगंधित-सुवासित, मादकता से युक्त वायु का स्पर्श सभी को आनंदित आंदोलित कर रहा है। प्रकृति की प्रसन्नता, खुशी-हास्य सर्वत्र बिखर रहा है। मानो एक बड़े उत्सव की यह साज-सज्जा है, सजावट है, समस्त भूमंडल एक विशाल सुसज्जित मंच के रूप में तैयार है। पक्षियों का कलरव, चहचहाहट, कोयल की कूक, उनकी स्वच्छन्द उड़ान एक संगीतमय वातावरण बनाते हुए अंतरिक्ष को सुसज्जित कर रहा है। पुष्पों की सुगंध से वायुमंडल `सुगंधिम् पुष्टिवर्धनम्', का पर्याय बन गया है। प्रकृति के द्वारा इत्रपान की व्यवस्था अनुभव हो रही है। पुष्पों फलों से लबालब वृक्ष अभिनंदन के लिए झुके हुए प्रसन्नचित्त, मुस्कराते, सुगंध बिखेरते हुए नववर्ष के आतिथ्य के लिए अपनी तैयारी दिखा रहे हैं।

पतझड़ के पश्चात वसंत में वसंत पंचमी के अवसर पर नवपल्लवित-पुष्पित पत्र-पुष्प और नव फसल को परमात्मा को अर्पण करते हैं।

होली के पश्चात चैत्र कृष्ण प्रतिपदा को वसंतोत्सव के रूप में नववर्ष के महोत्सव का आरंभ हो जाता है, जो एक पखवाड़े तक चलते हुए चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के सूर्योदय के अवसर पर नववर्ष का महोत्सव मनाया जाता है। इस प्रकार यह एकमात्र भारतीय नववर्ष है जो प्रकृति के साथ जुड़ा हुआ है, भव्य है, अद्वितीय है, महापर्व है।

पूर्णतः विज्ञान सम्मत है यह नव वर्ष

हमारे नये वर्ष को जानने के लिए किसी पंचांग या केलेन्डर की आवश्यकता नहीं है

ऊपर हमने लिखा है कि हमारा नया वर्ष प्रकृति के साथ जुड़ा हुआ है। नये वर्ष आने से बहुत पहले ही प्रकृति का संकेत हमें प्राप्त होने लगता है। पतझड़ के पश्चात वृक्ष पौधे अंकुरित पल्लवित-पुष्पित, फलित होकर भूमंडल को सुसज्जित करने लगता है, यह बदलाव हमें नवीन परिवर्तन का आभास देने लगता है। प्रकृति के संकेत को सुने, समझे और देखें तो नए वर्ष की सन्निकटता को समझ सकते हैं।

आकाश व अंतरिक्ष हमारे लिए एक विशाल प्रयोगशाला है। ग्रह-नक्षत्र-तारों आदि के दर्शन से उनकी गति-स्थिति, युति, उदय-अस्त से हमें अपना पंचांग स्पष्ट आकाश में दिखाई देता है। अमावस-पूनम को हम स्पष्ट समझ जाते हैं। पूर्णचंद्र चित्रा नक्षत्र के निकट हो तो चैत्री पूर्णिमा, विशाखा के निकट वैशाखी पूर्णिमा, ज्येष्ठा के निकट से ज्येष्ठ की पूर्णिमा इत्यादि आकाश को पढ़ते हुए जब हम पूर्ण चंद्रमा को उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र के निकट देखेंगे तो यह फाल्गुन मास की पूर्णिमा है और यहां से नवीन वर्ष आरंभ होने को १५ दिवस शेष है। इन १५ दिनों के पश्चात जिस दिन पूर्ण चंद्र अस्त हो तो अमावस (चैत्र मास की) स्पष्ट हो जाती है और अमांत के पश्चात प्रथम सूर्योदय ही हमारे नए वर्ष का उदय है।

इस प्रकार हम बिना पंचांग और केलेंडर के प्रकृति और आकाश को पढ़कर नवीन वर्ष को सहज ही प्राप्त कर लेते हैं। ऐसा दिव्य नववर्ष दुर्लभ है।

नव वर्ष और उज्जयिनी

देश के सबसे प्राचीन और समृध्द शहरों में से एक उज्जयिनी (जिसे आज उज्जैन भी कहा जाता है) को समस्त सिद्धांतकारों, पूर्वाचार्यों और ज्योतिर्विज्ञानवेत्ताओं ने कालगणना का केंद्र माना है। यहीं से समय की गणना होती है। सृष्ट्यादि- युगादि की गणना मानते हुए देश के समस्त पंचांगों की गणना उज्जयिनी मध्यमोदय लेकर होती है। यही कालगणना के प्रतीक ज्योतिर्लिंग महाकालेश्वर पृथ्वी की नाभि पर स्थित है, और स्कंद पुराण में उल्लेख है-

कालचक्रप्रवर्तको महाकाल: प्रतापन:।

पृथ्वी की भूमध्य रेखा और भौगोलिक कर्क रेखा यही उज्जयिनी में मिलती है, इसलिए भी यह स्थान समय गणना के लिए महत्वपूर्ण है। ज्योतिष के प्राचीनतम सूर्य सिद्धान्त में उज्जयिनी के महत्व को इस प्रकार प्रतिपादित किया है-

राक्षसालय दैवौक:शैलयोर्मध्यसूत्रग: ।

रोहितकमवन्ती च यथा सन्निहितं सर: ।।

इसी बात को `सिद्धान्तशिरोमणि' में भास्कराचार्य ने इस प्रकार लिखा है-

यल्लङ्कोज्जययिनी-पुरोपरि कुरुक्षेत्रादि देशान् स्पृशत्।

सूत्रं-मेरुगतं बुधैर्निगदिता सा मध्यरेखा भुव:।।

अन्य सिद्धांतों में हाह्मस्फुट सिद्धांत, वराहमिहिर की पंचसिद्धान्तिका, आर्यभटीय, ग्रहलाघव, केतकर का केतकी ग्रहगणित एवं तिलक का रैवतपक्षीय गणना आदि सभी ने उज्जयिनी मध्यमोदय को गणना का आधार स्वीकार किया है। नोबल पुरस्कार विजेता अमर्त्यसेन ने भी उज्जैन के इस महत्व को स्वीकारा है।

अत: स्पष्ट है कि जहाँ समस्त भूमंडल के स्वामी पृथ्वी की नाभि पर स्थित होकर काल-समय का संचालन कर रहे हैं। ऐसी पवित्र और सिद्धभूमि उज्जयिनी में ही कल्पादि-सृष्टि्यादि युगादि नववर्ष महोत्सव आयोजित करने का विशेष महत्व है।

कैसे मनाएं अपना नववर्ष

धर्मशास्त्र के निर्देशानुसार चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के प्रात: ब्रह्म मुहूर्त में नित्यकर्म से निवृत्त होकर अभ्यंग स्नान अथवा तीर्थ, नदी, सरोवर में स्नान करके शुद्ध पवित्र होवे। स्नान के पश्चात् अपने-अपने नगर के स्पष्ट सूर्योदय के समय (अथवा संपूर्ण देश में एक ही समय उज्जयिनी मध्यमोदय ६ बजकर २ मिनट पर) नववर्ष के शुभारंभ के अवसर पर सूर्य की प्रथम रश्मि के दर्शन के साथ ही शंख ध्वनि, ढोल-नगाड़े, तुरही, शहनाई आदि वाद्यों के साथ नववर्ष का उद्घोष करें। यह कार्य तीर्थ, नदी, सरोवर के तट पर अथवा धार्मिक स्थल पर एकत्रित होकर आयोजित करें।

नववर्ष के उद्घोष के पश्चात् समस्त उपस्थित आस्थावान् लोग पूर्व दिशा में मुख करके नीचे लिखे मंत्र से सूर्य को जल-पुष्प सहित अर्ध्य प्रदान करें।

आकृष्णेन रजसा व्वर्तमानो निवेशयन्नमृतम्मर्त्यञ्च ।

हिरण्ययेन सविता रधेना देवो याति भुवनानि पश्यन् ।।

सूर्य को जलार्ध्य प्रदान करने के पश्चात् नीचे लिखे मंत्र से उपस्थान करें।

विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परासुव यद् भद्रं तन्न आसुव ।

तश्चक्षुर्देवहितं पुरस्ताच्छुक्रमुश्चरत्

पश्येम शरद: शतम्, जीवेम शरद:शतम् शृणुयाम शरद: शतम् ।

प्रव्ववाम शरद: शुतम् अदीना: स्याम शरद: शतम् भूयश्र शरद: शतात्।

हे सविता देव, हमारे सभी दुखों को दूर करो। जिससे हमारा भला हो, वही प्राप्त कराओ। वह ज्ञानियों का हित करने वाला शुद्ध ज्ञान नेत्र पहले से उदित हुआ है। उसकी सहायता से सौ वर्षों तक नेत्रों से दिखाई देवे, सौ वर्षों का जीवन प्राप्त हो, सौ वर्षों तक श्रवण करें, सौ वर्षों तक अच्छी तरह से संभाषण करें, सौ वर्षों तक किसी के अधीन न रहे और सौ वर्षों से अधिक समय तक भी आनन्दपूर्वक रहें।

पश्चात् वैदिक संवत्सर मंत्र का पाठ करें

१. संवत्सरोसि परिवत्सरोसी दावत्सरोसीद् वत्सरोसि व्वत्सरोसि।

उखसस्ते कल्पन्ता-महोरात्रास्ते कल्पन्ता मर्द्धसास्ते कल्पन्ताम्मासास्ते कल्पन्तामृतवस्ते कल्पन्ता संव्वत्सरस्ते कल्प्पताम् ।

प्रेत्याएत्यै सञ्चाञ्च प्प्रसारय ।

सुपर्ण्ण चिदसि तया देवतयाङि्गरस्वद् धुवासीद।

२. समास्त्वाग्न ऋतवोव्वर्द्धयन्तु संवत्सरा ऋखयो जानि सत्या।

सन्दिव्ये नदीदिही रोचनेनव्विस्वा आभाहि प्प्रदिशस्चतस।।

सूर्य के द्वादश नामों के उच्चारण के साथ सामूहिक सूर्य नमस्कार करें।

वसन्तऋतु का स्मरण मंत्र से करें-

व्वसन्तेनऋतुना देवा व्वसवस्त्रिवृतास्तुता: ।

रथन्तरेण तेजसा हविरिन्द्रेव्वयोदधु ।।

सृष्टिकर्ता ब्रह्माजी की पूजन- जलसहित गंध, अक्षत, पुष्प लेकर देश-काल का उच्चारण करके इस प्रकार संकल्प करें।

`मम सकुटुम्बस्य सपरिवारस्य स्वजन परिजनसहितस्य आयुरारोग्यैश्चर्यादिसकल- शुभफलोत्तरोत्तराभिवृद्धयर्थं ब्रह्मादि संवत्सर देवतानां पूजनमहं करिष्ये।

ऐसा संकल्प करके स्वच्छ पाठ के ऊपर सफेद वस्त्र बिछाकर उस पर चावल से अष्टदल कमल बनाकर ब्रह्माजी की सुवर्ण प्रतिमा स्थापित करें। गणेश-अम्बिका पूजन के पश्चात् ` ब्रह्मणे नम:' मंत्र से ब्रह्माजी का आवाहनादि षोडशोपचार पूजन करें। प्रथम अवतार मत्स्य अवतार का भी पूजन करें।

ब्रह्माजी के लिए वैदिक मंत्र से ध्यान करें-

ब्रह्म जजान्प्रथमम्पुरस्ताद्धिसीमत सुरुचोव्वेन आव: ।

सबुध्न् याउपमा अस्यव्विष्ठा, सतश्चजोनिमसतश्चव्विव:।।

प्रथम मत्स्य अवतार का पूजन करके भागवत का यह मंत्र उच्चारण करें-

सोनुध्यातस्ततो राजाप्रादुरासीन्महार्णवे।

एक शृंर्गंधरो मत्स्यो हैमौ नियुत योजन: । भागवत ८।२४।४४

पूजन के पश्चात् विघ्न विनाश और वर्ष की सुमंगल भावना के लिए ब्रह्माजी की इस प्रकार प्रार्थना करें-

भगवैस्त्वत्प्रसादेन वर्षक्षेममिहास्तु मे ।

संवत्सरोपसर्गा मे विलयं यान्त्वशेषत: ।।

प्रार्थना के पश्चात् ध्वजपूजन, ध्वजवन्दन, कलशार्चन विधि विधान से करें। गीत, वाद्य, नृत्य, लोकगीतों के माध्यम से नववर्ष उत्साह और उमंग के साथ मनावें। आज के दिन नीम की पत्तियाँ खाने का विशेष महत्व है, लिखा है-

पारिभद्रस्य पत्राणि कोमलानि विशेषत:।

सुपुष्पाणि समानीय चूर्णंकृत्वा विधानत: ।

मरीचिं लवणं हिंगु जीरणेण संयुतम्।

अजमोदयुतं कुत्वा भक्षयेद्रोगशान्तये ।

नीम के कोमल पत्ते, पुष्प, काली मिर्च, नमक, हींग, जीरा मिश्री और अजवाइन मिलाकर चूर्ण बनाकर आज के दिन सेवन करने से संपूर्ण वर्ष रोग से मुक्त रहते हैं। तीर्थ की आरती पूजन करके मंत्र पुष्पांजली और प्रसाद वितरण के पश्चात् नववर्ष का अभिनन्दन और परस्पर शुभकामना, मंगलकामना, नववर्ष मधुर मिलन आदि व्यवहारिक पक्ष के साथ पंचांग का फल श्रवण करें। नवसंवत्सर आरंभ के दिन नूतन वर्ष के पंचांग की पूजन, पंचांग का फल श्रवण, पंचांग वाचन और पंचांग का दान करने का उल्लेख धर्मशास्त्र में लिखा है। यह परंपरा आज भी गाँव-गाँव में प्रचलित है, गांव गुरु, गांवठी, पुरोहित आदि गांवों में पंचांग वाचन करते हैं। विद्वान का पूजन-अर्चन, ब्राह्मणों को भोजन, दक्षिणा वस्त्रादि से अभिनंदन करे।

अपने-अपने घरों में ध्वज लगावें (गुडी लगावें) ध्वज पूजन करें। घरों को दीप और विद्युत्सज्जा से आलोकित करें।

द्यौ: शान्तिरन्तरिक्षं शान्ति:

पृथिवी: शांन्ति: आप: शान्ति:

औषधय: शान्ति: वनस्पतय:शान्ति:

विश्वेदेवा: शान्ति: ब्रह्मशान्ति:

सर्व शान्तिरेवशान्ति: सामाशान्तिरेधि ।

सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया: ।

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दु:खमाप्नुयात् ।।

ओम शान्ति: शान्ति: शान्ति:।

(लेखक देश के जाने माने ज्योतिषाचार्य हैं और महर्षि सांदीपनि के वंशज हैं। इनके परिवार द्वारा विगत कई पीढि़यों से पंचांग का प्रकाशन किया जा रहा है, जिसे नारायण विजय पंचांग के रूप में दुनिया भर में प्रतिष्ठा प्राप्त है)

गुड़ी पड़वा और इसका महत्व

चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा वर्ष प्रतिपदा कहलाती है। इस दिन से ही नया वर्ष प्रारंभ होता है। ‘युग‘ और ‘आदि‘ शब्दों की संधि से बना है ‘युगादि‘ । आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में ‘उगादि‘ और महाराष्ट्र में यह पर्व ‘ग़ुड़ी पड़वा‘ के रूप में मनाया जाता है।

कहा जाता है कि इसी दिन ब्रह्माजी ने सृष्टि का निर्माण किया था। इसमें मुख्यतया ब्रह्माजी और उनके द्वारा निर्मित सृष्टि के प्रमुख देवी-देवताओं, यक्ष-राक्षस, गंधवारें, ऋषि-मुनियों, नदियों, पर्वतों, पशु-पिक्षयों और कीट-पतंगों का ही नहीं, रोगों और उनके उपचारों तक का भी पूजन किया जाता है। इसी दिन से नया संवत्सर शुंरू होता है। अत इस तिथि को ‘नवसंवत्सर‘ भी कहते हैं।

शुक्ल प्रतिपदा का दिन चंद्रमा की कला का प्रथम दिवस माना जाता है। जीवन का मुख्य आधार वनस्पतियों को सोमरस चंद्रमा ही प्रदान करता है। इसे औषधियों और वनस्पतियों का राजा कहा गया है। इसीलिए इस दिन को वर्षारंभ माना जाता है। आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और महाराष्ट्र में सारे घरों को आम के पेड़ की पत्तियों के बंदनवार से सजाया जाता है। सुखद जीवन की अभिलाषा के साथ-साथ यह बंदनवार समृद्धि, व अच्छी फसल के भी परिचायक हैं। ‘उगादि‘ के दिन ही पंचांग तैयार होता है। महान गणितज्ञ भास्कराचार्य ने इसी दिन से सूर्योदय से सूर्यास्त तक दिन, महीना और वर्ष की गणना करते हुए ‘पंचांग ‘ की रचना की थी।

चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा को महाराष्ट्र में गुड़ीपड़वा कहा जाता है। वर्ष के साढ़े तीन मुहुर्तों में गुड़ीपड़वा की गिनती होती है। शालिवाहन शक का प्रारंभ इसी दिन से होता है। इस अवसर पर आंध्र प्रदेश में घरों में ‘पच्चड़ी/प्रसादम‘ के रूप में बांटा जाता है। कहा जाता है कि इसका निराहार सेवन करने से मानव निरोगी बना रहता है। चर्म रोग भी दूर होता है। इस पेय में मिली वस्तुएं स्वादिष्ट होने के साथ-साथ आरोग्यप्रद भी होती हैं। महाराष्ट्र में पूरन पोली या मीठी रोटी बनाई जाती है। इसमें—गुढ़, नमक, नीम के फूल, इमली और कच्चा आममिलाया जाता है। गुढ़ मिठास के लिए, नीम के फूल कड़वाहट मिटाने के लिए और इमली व आम जीवन के खट्टे-मीठे स्वाद चखने का प्रतीक के रूप में होते हैं। भारतीय परंपरा में घरों में इसी दिन से आम खाने की आम का रस बनाने की और आम के रस की मिठाई बनाने की शुरुआत होती है।

गुड़ी पड़वा की लोक कथा:

शालिवाहन नामक एक कुम्हार के लड़के ने मिट्टी के सैनिकों की सेना बनाई और उस पर पानी छिड़ककर उनमें प्राण फूँक दिए और इस सेना की मदद से शक्तिशाली शत्रुओं को पराजित किया। इस विजय के प्रतीक के रूप में शालिवाहन शक का प्रारंभ हुआ।

एक कथा यह भी है कि इसी दिन भगवान राम ने बाली के अत्याचारी शासन से दक्षिण की प्रजा को मुक्ति दिलाई थी । बाली के त्रास से मुक्त हुई प्रजा ने घर-घर में उत्सव मनाकर ध्वज (ग़ुड़ियां) फहराए थे। आज भी घर के आंगन में ग़ुड़ी खड़ी करने की प्रथा महाराष्ट्र में प्रचलित है। इसीलिए इस दिन को गुड़ीपडवा नाम दिया गया।

गुड़ी पड़वा के साथ ही नौ दिन की चैत्र की नवरात्रि शुरु हो जाती है। नौ दिन तक चलने वाली यह नवरात्रि दुर्गापूजा के साथ-साथ, रामनवमी को राम और सीता के विवाह के साथ सम्पन्न होती है।